हनुमान न्यूज़ में आपका स्वागत है। यहां पर आपको विमला देवी मंदिर से जुड़ी हर जानकारी मिलेगी जैसे की मंदिर का इतिहास मंदिर से जुड़ी तांत्रिक कथाएं, जाने का बेहतरीन समय, प्रसाद एवं दर्शन व्यवस्था, कई सारे रोचक तथ्य वगैरा।
विमला देवी शक्तिपीठ के बारे में जानकारी
विमला मंदिर को एक शक्ति पीठ माना जाता है। कुछ मान्यताओं के अनुसार यहाँ सती माता की नाभि या हड्डी का कोई अंग गिरा था इसलिए इस स्थान का महत्व वैष्णव और शैव शाक्त, दोनों परंपराओं में है। देवी बिमला को जगन्नाथ जी की शक्ति माना जाता है। पुराणों के अनुसार, जब तक भगवान जगन्नाथ को देवी विमला को प्रसाद नहीं चढ़ाया जाता, तब तक जगन्नाथ का भोग पूर्ण नहीं माना जाता। उड़ीसा परंपरा में देवी बिमला को भैरवी शक्ति और मातृका देवी के रूप में पूजा जाता है।
- कंकालितला मंदिर : Click Here
- वैष्णो देवी मंदिर : Click Here
विमला देवी शक्तिपीठ का पूर्ण इतिहास
मंदिर का सबसे प्राचीन स्रोत 7वीं से 9वीं सदी से पहले का है। स्कंद पुराण के उड्राखण्ड में बिमला मंदिर का उल्लेख है, जो जगन्नाथ मंदिर से भी पुराना माना जाता है। इससे संकेत मिलता है कि इसका मूल शक्ति पीठ स्वरूप संभवतः 8वीं ओर 9वीं सदी या उससे भी पहले का है। उस समय यह क्षेत्र तांत्रिक शक्ति उपासना का प्रमुख स्थान था। सबसे पहले किस शासक ने बनवाया, इस पर पक्की शिलालेखीय जानकारी नहीं है, परंतु मूल मंदिर प्राचीन, पुराणकालीन और लोकतंत्र परंपरा से उभरा है। 11वीं से 12वीं सदी के दौरान पुरी में आज दिखने वाला पत्थर का विमला मंदिर गंग वंश ने बनवाया। साल 1078 से 1147 के दौरान अनन्तवर्मन चोडगंग देव मैं कई सारे मंदिर बनवाए थे साथ ही में बड़े पैमाने पर कलिंग शैली के मंदिर बनवाए थे। माना जाता है कि जगन्नाथ मंदिर का भी मुख्य निर्माण इन्हीं ने करवाया था। उसी काल में बिमला मंदिर का प्राचीन रूप व्यवस्थित रूप से पत्थर का बनाया गया।
उस काल में पुरानी शक्ति स्थापना को ग्रेनाइट और बलुआ पत्थर से पुनर्निर्मित किया गया, मंदिर को श्रीमंदिर परिसर के मुख्य शक्तिपीठ के रूप में स्थापित किया गया और साथ ही बिमला देवी को “जगन्नाथ की शक्ति” घोषित किया गया।
मत्स्य और सोमवंशी का प्रभाव 10वीं 11वीं सदी के अवशेष मैं मिलता है। इस काल के कुछ शिल्प मातृका मूर्तियाँ, यक्षिणी आकृतियाँ जैसी चीजें बताते हैं कि गंग वंश से पहले भी यहाँ छोटा शक्ति स्थान था, जिस पर लगातार लोक पूजन होता रहा। 15वीं–16वीं सदी को गजपति काल के नाम से जाना जाता है और साथ ही यह तांत्रिक प्रतिष्ठा का विस्तार रहा था। गजपति राजाओं ने पुरी की शक्ति पूजा को काफी प्रोत्साहन दिया। इस समय बिमला देवी को जगन्नाथ के महाप्रसाद की अधिकारिणी घोषित किया गया था। नवरात्रि और पंचमी तांत्रिक अनुष्ठानों को दरबारी संरक्षण मिला और मंदिर के आसपास कई छोटे देवालय जोड़े गए।
1751 से 1803 के दौरान मराठा शासन मैं मंदिर का पुनः संरक्षण हुआ। मराठाओं ने पुरी की धार्मिक व्यवस्थाओं को मजबूत किया था। बिमला मंदिर की नियमित पूजा, नियमावली और महाप्रसाद प्रणाली को व्यवस्थित किया और कुछ छोटे उप मंदिर और मंडप इसी समय मजबूत किए गए।
ब्रिटिश शासन यानी कि सन 1803 से 1947 के दौरान वह मंदिर का संरक्षण करते थे परंतु नियंत्रण के साथ। अंग्रेजों ने मंदिर पर सीधे नियंत्रण नहीं किया, लेकिन मंदिर रिकॉर्ड, संपत्ति विवरण, पुजारी व्यवस्था को दर्ज करवाया। 19वीं सदी के ASI विवरणों में विमला मंदिर को “पुरी शक्ति स्थल बहुत प्राचीन” बताया गया। सन 1960 से 1970 के दौरान पुरातत्व सर्वेक्षण ने मंदिर के पत्थर, दीवार और गर्भगृह की मरम्मत की। सन 1980 से 2000 के दौरान मंदिर के भीतर मूल मूर्ति की पुनःस्थापना करवाई गई, दीवारों की सफाई, अलंकरण और सुरक्षा व्यवस्था स्थापित की गई। सन 2000 से 2020 के दौरान श्री मंदिर एक्ट के अंतर्गत विमला मंदिर आज शक्तिपीठ साथ ही श्रीमंदिर का मुख्य अंग दोनों के रूप में संरक्षित है।नवरात्रि के अनुष्ठान पूरी तरह नियमित किए गए। CCTV, सुरक्षा, प्रवेश नियंत्रण आदि बढ़े।
विमला देवी शक्तिपीठ मंदिर से जुड़े रहस्य और मान्यताएं
यह सबसे अनोखा शक्तिपीठ है। पुरी में जगन्नाथ मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध है, लेकिन कम लोग जानते हैं कि जगन्नाथ का नाभिदेश बिमला देवी हैं। हर भोग और प्रसाद पहले देवी बिमला को अर्पित किया जाता है, तभी भगवान जगन्नाथ उसे स्वीकार करते हैं। इसे तांत्रिक परंपरा में ‘शक्ति प्रधान’ व्यवस्था कहा जाता है।
सती के पाद ओर तल का पतन परंतु तांत्रिक शक्ति का केंद्र भी है। पुरी का विमला शक्तिपीठ सती के पाद ओर तल के पतन स्थल के रूप में माना जाता है। कथाओं में बताया गया है कि यहाँ “भूमिगर्भ” में सती का पादथि रहता है, इसलिए इसे ‘धरती के भीतर छिपा शक्तिपीठ’ भी कहा जाता है।
विमला देवी का रूप बाहर से सरल और भीतर से उग्र हैं। मूर्ति बाहर से शांत दिखती है, परन्तु तांत्रिक मत में इन्हें उग्र तारा, काली, या कामाख्या की सहोदर शक्ति भी कहा जाता है। कुछ गूढ़ ग्रन्थ बताते हैं कि देवी के गर्भगृह में रात के समय ऊर्जा इतनी तीव्र होती है कि साधना केवल सिद्धों को ही अनुमति है।
पुरातन तांत्रिकों का प्रवेश और ‘गरुड़द्वार’ का गूढ़ महत्व। बिमला जी का गर्भगृह जगन्नाथ मंदिर के दक्षिण पश्चिम कोने में है। पुराने तांत्रिकों का मानना था कि मंदिर का यही कोना ‘रहस्यमय क्षेत्र’ है, यहाँ रात्रि कालीन तंत्र साधना की जाती थी, और यह मार्ग गरुड़द्वार से जुड़ा है, जिसे तांत्रिक प्रवेश द्वार कहा जाता था।
‘रक्त’ और ‘मत्स्य” भोग की चिर पुरातन परंपरा है। अधिकांश शक्तिपीठों में उग्र रूप से बलि या मत्स्य आदि की प्राचीन परंपरा रही है। पुरी की स्थानीय किंवदंती में कहा जाता है कि पुराने समय में नवरात्रि में शक्ति तत्त्व के रूप में मत्स्य या विशेष भोग चढ़ता था। अब यह परंपरा केवल प्रतीकात्मक रूप में की जाती है।
रात के समय गर्भगृह में प्रवेश का रहस्य कुछ इस प्रकार है।लोककथाओं में माना जाता है कि रात के कुछ विशेष मुहूर्तों में देवी का उग्र रूप सक्रिय रहता है, इसलिए प्राचीन काल में सामान्य लोगों को रात में गर्भगृह में जाने की अनुमति नहीं थी। यह पद्धति कई तंत्रपीठों में अब भी देखी जाती है।
जगन्नाथ मंदिर के ‘पंच तत्त्व’ रक्षा चक्र का केंद्र है। पुरी के पूरे मंदिर परिसर के बारे में कहा जाता है कि यह पाँच शक्तियों से संरक्षित है। जिसमें बिमला (शक्ति), लक्ष्मी (समृद्धि), नरसिंह (रक्षा), गरुड़ (वायु-तत्व) और कलाभैरव (काला–तत्त्व) इन पाँच में बिमला देवी केंद्रीय शक्ति हैं। इनके बिना मंदिर के अन्न, रथ, स्नान, यात्रा आदि कोई भी अनुष्ठान पूरा नहीं माना जाता।
विमला मंदिर के नीचे ‘गुप्त मार्ग’ की किंवदंतियाँ कुछ इस प्रकार है।स्थानीय पुरोहित और पंडा परंपरा में कहा जाता है कि, मंदिर के नीचे कभी गुप्त मार्ग थे, जिनका उपयोग तांत्रिक, पुजारी और राजपुरोहित करते थे। अब वे मार्ग बंद या भूमिगत माने जाते हैं।
असाधारण ‘शक्ति’ परंतु केवल सिद्ध तांत्रिकों को अनुभव होता है।कई तांत्रिक ग्रन्थ बिमला को “उड़ीसा की मूल गुप्त देवी”, “तारा काली की मध्य शक्ति” कहते हैं। कुछ साधक मानते हैं कि यहाँ दशमहाविद्या तारा और काली की संयुक्त शक्ति सक्रिय है। यह सिद्धी दुर्लभ मानी जाती है।
रथयात्रा के समय देवी का ‘अनदेखा अधिकार’ दिखता है। रथयात्रा में जगन्नाथ जी बाहर आते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं किगुंडिचा पूजा की सफलता बिमला देवी के आशीर्वाद के बिना अधूरी मानी जाती है। कुछ पंडा यह भी कहते हैं कि रथयात्रा की ऊर्जा चक्र को स्थिर करने वाली अदृश्य शक्ति बिमला ही हैं।
विमला देवी शक्तिपीठ मंदिर में प्रसाद व्यवस्था
विमल माता के प्रसाद को शुद्ध सात्विक और तांत्रिक परंपरा का भाग माना जाता है मुख्यतः यहां पर प्रसाद मिलता है जिसमें कणिका जो गुड, चावल और देसी घी का मिश्रण होता है साथ ही चावल, दाल, साग, सब्जी, खीर जैसी कई सारी चीज मिलती है। विमला मंदिर का भोजन श्रीमंदिर में चढ़ने वाले महाप्रसाद से जुड़ा होता है, इसलिए इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है। प्रसाद प्राप्त करने के लिए मंदिर के गर्भगृह के बाहर अथवा प्रवेश परिसर में एक छोटा प्रसाद वितरण काउंटर होता है यहां रोज सीमित मात्रा में प्रसाद मिलता है साथ ही श्रीजगन्नाथ मंदिर के ‘अन्नछत्र’ एवं ‘रोसोईघर’ सेक्योंकि माता बिमला, जगन्नाथ भोग की अंतिम स्वीकारकर्ता हैं, इसलिए उनका प्रसाद श्रीमंदिर के महाप्रसाद से जुड़ा है। यह प्रसाद अन्नछत्र से आसानी से लिया जा सकता है।
>विमल माता का प्रसाद जगरनाथ महाप्रसाद ही माना जाता है क्योंकि परंपरा के अनुसार जगरनाथ भोग तभी पूर्ण होता है जब वह पहले देवी बिमला को निबेदित किया जाता है। इसीलिए बिमला प्रसाद का आध्यात्मिक महत्व और शक्ति बहुत अधिक माना जाती है।
विमला देवी शक्तिपीठ मंदिर में बलि प्रथा
लगभग नवीन से दसवीं शताब्दी के दौरान कुछ परंपराओं के अनुसार यहां पर त्रिक,कौल,तांत्रिक शाक्त परंपराओं का उद्धव था। देवी विमला को ‘भूमि-शक्ति’ और ‘तांत्रिक ऊर्जा का मूल केंद्र’ माना गया।इसी समय से रात्रि पूजा और बलि परंपरा शुरू होती है। उसे समय के दौरान आम जनता से बहुत दूर बलि केवल तांत्रिक को द्वारा की जाती थी। बलि हमेशा गुप्त रूप में की जाती थी अक्सर मांस और रक्त नैवेद्य प्रतीकात्मक रूप में किए जाते थे, लेकिन कभी प्रसाद के रूप में वितरण नहीं किया गया। उस समय बलि सिर्फ़ “दर्शनीय” नहीं थी, बल्कि पूरी तांत्रिक तंत्र साधना का अंग मानी जाती थी।
11वीं से 14वी शताब्दी के दौरान गंग वंश और सोमवंशी युग में बलि प्रथा अपनी चरम सीमा पर थी। कहां जाता है कि श्री जगन्नाथ मंदिर की वस्तु उसे समय बनी, विमला देवी को श्री मंदिर का आधार शक्ति माना गया साथ ही तांत्रिक पूजा और बलि व्यापक रूप में विस्तृत हुए। इस समय नवमी, अष्टमी, पंचमी की रात को तांत्रिक पूजा होती थी। रक्त नैवेद्य मास नैवेद्य सामान्यतः सिर्फ तांत्रिक करते थे, कई बार साक्षात कई बार प्रतीकात्मक होती थी।
16वीं से 18वीं शताब्दी के दौरान बलि प्रथा का विरोध और गिरावट शुरू हुआ। इस समय वैष्णव दर्शन का प्रवेश हुआ, चैतन्य महाप्रभु और रामानंदी विष्णु संतों के प्रभाव से जगन्नाथ मंदिर को सात्विक घोषित किया गया बल्कि मध, मांसाहारी नैवेद्य को अशुद्ध माना जाने लगा। गणपति शासको की नए आदेश आए जिसमें गजपति प्रतापरूद्र, नबीसिंह, मुकुंददेव आदि शासको ने श्री मंदिर में बलि निषेध से फरमान जारी किया। विमल मंदिर श्रीमंदिर परिसर के अंदर होने के कारण नियम लागू हुए।
19वीं से 20वीं शताब्दी के दौरान औपचारिक रूप से सार्वजनिक बलि प्रथा पूरी तरह बंद हुई। मांस मछली चढ़ने पर नियम बनाए गए, आज के समय सिर्फ प्रतीकात्मक तांत्रिक नैवेद्य ही बचा है सार्वजनिक बाली 100% तक बंद है।
विमला देवी शक्तिपीठ मंदिर में आरती और दर्शन का समय
मंदिर में सामान्य दर्शन का समय:
- सुबह: 5:30 AM-12:00 PM
- दोपहर: 12:30 PM-1:30 PM
- शाम: 4:00 PM-9:00 PM
श्री मंदिर के मुख्य नीतियों के अनुसार समय थोड़ा ऊपर नीचे हो सकता है।
आरती का समय:
- सुबह 5:30 से 7:00 के दौरान प्रातः पूजा
- सुबह 11:00 से 12:00 के बीच मध्याह्न भोग पूजा
- शाम 6:00 से 7:30 के बीच संध्या पूजा
- रात 8:30 से 9:15 के बीच रात्रि निशा पूजा जो कभी-कभी होती है।
विमला देवी शक्तिपीठ मंदिर के नीति नियम (Rule’s of Vimla Devi Shaktipeeth)
मंदिर के मुख्य नियम कुछ इस प्रकार है कि: केवल हिंदू धर्मावलंबियों को प्रवेश की अनुमति है। फोटो-वीडियो पूरी तरह प्रतिबंधित है। गर्भगृह में मोबाइल का उपयोग मना है। धूम्रपान, पान, गुटखा, शराब पूरी तरह वर्जित है। मंदिर परिसर में जूते चप्पल ले जाना मना है।
मंदिर के कुछ पूजा नियम है जैसे कि केवल पंडा समुदाय को गर्भगृह स्पर्श पूजा का अधिकार है भक्त केवल दूर से दर्शन कर सकते हैं। देवी को चढ़ावे में केवल फूल, नारियल, चुनरी, मिठाई जैसी चीज़ें चढ़ा सकते हैं। किसी भी प्रकार का मांसाहारी चढ़ना वर्जित है।
मंदिर में ऊंची आवाज में बोलना मना है, कतार तोड़ना निषिद्ध है। पुजारी और सेवायतों के निर्देश का पालन अनिवार्य है। देवी के सामने अनदर पूर्वक व्यवहार हंसी मजाक जैसी चीज वर्जित है। गर्भगृह के पास रुककर भीड़ इकट्ठी नहीं की जा सकती। बैक कैमरा जैसी कोई भी चीज अंदर ले जाना माना है। मासिक धर्म के दौरान गर्भगृह में प्रवेश न करने का पारंपरिक नियम है। गर्भवती महिलाओं के लिए भीड़ वाले दिनों में अलग निर्देश है। पुरुष और महिलाएं मंदिर को शोभित हो सके ऐसे कपड़े ही पहन सकते हैं। किसी भी प्रकार के अंग दिखे ऐसे कपड़े पहनना संपूर्ण वर्जित है।
विमला देवी शक्तिपीठ मंदिर के त्यौहार
(1) नवरात्रि:
नवरात्रि मंदिर का सबसे बड़ा पर्व है। यह विमला मंदिर का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है। यहां पर अष्टमी, नवमी, महाअष्टमी पर विशेष तांत्रिक पूजा होती है। उस समय के दौरान रात की निषा पूजा, विशेष भोग, अलंकरण होते हैं जिस वजह से अत्यधिक भीड़ रहती है।
(2) दुर्गा अष्टमी-महाअष्टमी:
इस समय देवी के “उग्रस्वरूप” की पूजा की जाती है। उस समय तांत्रिक शाक्त विधि होती है। विशेष भोग अर्पण किया जाता है। माँ बिमला का लाल वस्त्र अलंकरण होता है।
(3) महालया अमावस्या:
यह पितृ तर्पण और देवी अवहारण का दिन है। विमला मंदिर में विशेष दीप पूजन किया जाता है। तंत्र पूजाओं में यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण तिथि है।
(4) कुमारी पूजा:
नवरात्रि के दौरान 5-9 वर्ष की कन्याओं को विमला का रूप मानकर पूजन किया जाता है। खासकर शारदीय नवरात्रि में यह पूजन होते हैं।
(5) दीपावली-काली पूजा:
उसे दिन काली स्वरूप की निषा पूजा की जाती है। रात्रि में तांत्रिक विधियाँ होती है। विशेष दीपदान और मंत्रोच्चार किए जाते हैं। यह बिमला मंदिर में अत्यंत महत्वपूर्ण रात मानी जाती है।
(6) कोजागरी लक्ष्मी पूजा:
रात भर दीप ज्योति जलाकर विमला मंदिर में “कोजागरी लक्ष्मी” स्वरूप की पूजा होती है। ओडिशा में इसे बहुत शुभ माना जाता है।
(7) पञ्चमी-षष्ठी के विशेष पर्व:
हर मास की शुक्ल पंचमी को शक्ति पूजा होती है। भक्तों की संख्या अधिक रहती है।
(8) बिमला जयंती:
यह कुछ ओडिया परंपराओं में देवी का “अवतरण दिवस” के रूप में मनाया जाता है। इसे विशेष पूजा के साथ मनाया जाता है।
विमला देवी शक्तिपीठ मंदिर की वास्तुकला
- मंदिर की वास्तुकला पूर्णतः कलिंग शैली में बनी है। विमला देवी मंदिर तीन मुख्य भागों से मिलकर बनता है जिसमें सर्वप्रथम गर्भगृह, जगनमोहन और कुछ विद्वानों के अनुसार एक छोटा नाटमंडप भी होता है।
- गर्भगृह का शिखर ऊंचा, सीधा और रेखाओं से युक्त होता है। ऊपर ‘आमलक’ और ‘कलश’ स्थित है। पत्थर पर काटी गई सीधी धारा वाली रेखाएँ और वक्रता इसकी पहचान हैं।
- मुख्य सामग्री खड़िया पत्थर और स्थानीय चुनापत्थर है। पत्थरों को बिना गारे के लोक फिट तरीके से जोड़ा गया है। नक्काशी ओडिशा की परंपरागत पद्धति में हाथ से की गई है।
- विमला मंदिर की दीवारों पर अत्यंत बारीक काम देखने को मिलता है जिसमें देवी देवताओं की मूर्तियाँ, विभिन्न सप्तमातृकाएँ जिसमें गणेश, कार्तिकेय, यक्ष शामिल है साथ ही तांत्रिक प्रतीकों की नक्काशी की गई है। तांत्रिक प्रभाव वाली आकृतियाँ भी देखने को मिलती है। मंदिर के कुछ कोनो पर श्मशान, कपाल, त्रिशूल, महिष, सिंह, शक्तिपूजन से जुड़ी आकृतियाँ बनी हैं।
- गर्भगृह की विशेषता कुछ इस प्रकार है कि, अंदर देवी विमला काले काष्ठ पाषाण सम्मिश्रित रूप में विराजित हैं। उनका स्वरूप तांत्रिक शक्ति का द्योतक माना जाता है। गर्भगृह छोटा, कम रोशनी वाला और अत्यंत शांत है इसीलिए तांत्रिक पूजा परंपरा के अनुरूप माना जाता है।
- जगमोहन यानी की सभा मंडप की चौकोर संरचना, नीचे मोटे स्तंभ, छत पर सुंदर पुष्प नक्काशी और प्रवेश द्वार पर मंदिर रक्षकों की मूर्तियाँ भी है।
- मंदिर 9वीं 10वीं शताब्दी यानी की सोमवंशी काल का माना जाता है। बाद में गंग वंश द्वारा पुनः अलंकरण और विस्तार हुआ। आज यह जगन्नाथ मंदिर परिसर का एक संरक्षित वास्तु खण्ड है।
विमला देवी शक्तिपीठ मंदिर के आसपास घूमने की जगह
[1] पुरी समुद्र तट:
दूरी: 2 किमी
यहां पर आप हंस करके सूर्योदय ढोल नृत्य देख सकते हैं साथ ही ऊंट की सवारी कर सकते हैं नारियल पानी पी सकते हैं और स्वच्छ रेत का आनंद ले सकते हैं। शाम को घूमना सबसे अच्छा माना जाता है।
[2] स्वर्गद्वार:
दूरी: 3 किमी
यहां पर आप पवित्र समुद्र स्नान कर सकते हैं और साथ ही संध्या आरती का अनुभव कर सकते हैं। यहाँ महाप्रसाद की दुकानों की भी भरमार है।
[3] गुंडिचा मंदिर:
दूरी: 3 किमी
रथ यात्रा के समय जहां भगवान जगन्नाथ का शांत, विशाल विश्राम स्थल है।
[4] लोकनाथ मंदिर:
दूरी: 2 किमी
यहां पर पार्थिव शिवलिंग जलमग्न रहता है और वह अत्यंत शक्तिशाली मान्यता रखता है।
[5] सोनार गौरंगा मंदिर:
दूरी: 2.5 किमी
यह गौड़ीय वैष्णव परंपरा का सुंदर मंदिर है।
[6] पुरी लाइट हाउस:
दूरी: 3-4 किमी
यहां पर 360° समुद्र दृश्य मिलता है जिसकी वजह से फोटो के लिए यह बेहतरीन स्थान है। यह शाम 4 से 5:30 तक खुला रहता है।
[7] नरेंद्र सरोवर:
दूरी: 2 किमी
भगवान जगन्नाथ की ‘चंदन यात्रा’ यहीं होती है। यहां पर शांत जलाशय है जिसकी वजह से यह जगह फोटोग्राफी के लिए बढ़िया है।
[8] साक्षी गोपाल मंदिर:
दूरी: 17 किमी
यहां पर जीवंत स्वरूप का गोपाल है। यह प्रसिद्ध प्रेमकथा से जुड़ा मंदिर है।
[9] चिलिका झील:
दूरी: 48 किमी
खास करके यह जगह डॉल्फ़िन देखने का स्थान है। इस झील पर नौका विहार भी कर सकते हैं। यह जगह प्रकृति प्रेमियों के लिए बेहतरीन है
[10] आलनंतर मंदिर:
दूरी: 25 किमी
यह अनंत विष्णु का पवित्र स्थान है। यहां पर जगन्नाथ के अनावरणकाल में हजारों भक्त आते हैं।
[11] कोणार्क सूर्य मंदिर:
दूरी: 35 किमी
यह विश्व विरासत स्थल हैं , यहां पर रथ आकार की अद्भुत वास्तुकला है। यह पुरी यात्रा का सबसे लोकप्रिय हिस्सा है।
[12] रामचंडी बीच:
दूरी: 28–30 किमी
यह शांत समुद्र तट है जहां पर आप कयाकिंग, वॉटर स्पोर्ट्स आनंद ले सकते हैं। कोणार्क जाते हुए रास्ते में आता है।
[13] नरीसीमेंश्वरा मंदिर:
दूरी: जगन्नाथ मंदिर से 1 किमी
यह शक्तिशाली नरसिंह भगवान का मंदिर है जो अपनी बेहतरीन वास्तुकला से सज्ज है।
विमला देवी शक्तिपीठ मंदिर जाने का बेहतरीन समय
मंदिर जाने का सर्वश्रेष्ठ समय अक्टूबर से मार्च का है। यह समय को पुरी का पिक पर्यटन सीजन भी कहा जाता है। इस समय मौसम ठंडा और सुहाना होता है, समुद्र तट घूमने में आसानी रहती हैं, मंदिर में भीड़ भी संतुलित होती है और रात की तांत्रिक परंपरा इसी मौसम में होते हैं परंतु बहुत आम भक्ति के लिए नहीं है। इस दौरान कुछ प्रमुख उत्सव होते हैं जैसे कि शारदीय नवरात्रि, कुमार पुर्णिमा, पोष पूर्णिमा, माघ मेला, बसंती दुर्गा पूजा वगैराह।
आप जुलाई से अगस्त के दौरान रथ यात्रा के समय दी जा सकते हैं। पुरी का सबसे महान पर्वत जगन्नाथ रथ यात्रा है इस दौरान यदि आप भीड़ से परेशान नहीं होते तो आध्यात्मिक रूप से अत्यंत शक्तिशाली समय में जा सकते हैं। यहां इस समय देवी विमला के दर्शन का विशेष महत्व है, पूरे शहर में उत्सव का वातावरण होता है, ऐतिहासिक परंपरा देखने का अवसर भी सर्वश्रेष्ठ है।
विमला देवी शक्तिपीठ मंदिर जाने की सुविधा
यहां पर भारत को भारत प्रमुख शहरों में से ट्रेन आती है। भारत के हर शहर से पुरी जाने के लिए ट्रेन और बस की सुविधा है। हवाई मार्ग से आने के लिए आपको भुवनेश्वर एयरपोर्ट पर उतरना पड़ेगा वहां से आपको टैक्सी या बस की सुविधा मिल जाएगी। साथ ही में रहने और खाने के लिए आपको नजदीक में कई सारी होटल मिल जाएगी जहां पर आप अपनी सुविधा के अनुसार रह सकते हैं।
विमला देवी शक्तिपीठ मंदिर के बारे में कुछ रोचक जानकारी
• पुरी में जितना वैष्णव प्रभाव दिखता है उतना ही गहराई में तांत्रिक शक्ति साधना का केंद्र विमला देवी का गर्भगृह है रात में यहां कई विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। (अब अधिकांश सीमित है)
• ऐसा माना जाता है कि यहां पर सती का नाभि गिरा था इसीलिए इस संपूर्ण शक्ति स्थान माना जाता है क्योंकि नाभि को उत्पत्ति और ऊर्जा का बीज कहा गया है इसलिए इसका तांत्रिक महत्व भी अधिक है।
• पुरी का प्रसिद्ध जगरनाथ महाप्रसाद तभी पूर्ण माना जाता है जब उसे सबसे पहले विमला देवी को भोग लगाया जाता है। यह परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है।
• विमल मंदिर जगन्नाथ मंदिर से भी पुराना माना जाता है। कई विद्वानों के अनुसार विमला देवी का स्थल जगन्नाथ मंदिर से पहले का है। पुराना तांत्रिक स्थल होने के कारण इसे वैष्णव धर्म में बाद में जोड़ा गया।
• विमला देवी को पूरी की छिपी संरक्षिका माना जाता है। स्थानीय विश्वास कहते हैं कि “जगन्नाथ राज करते हैं पर रक्षा विमला करती है” पूरी पर कोई विपत्ति ना आए इसका आध्यात्मिक भार देवी के ऊपर है।
• देवी का स्वरूप अत्यंत प्राचीन है। लकड़ी और पाषाण मिश्रित मूर्तियां हैं यहां पर है। यह रूप भारतीय मंदिरों में बहुत ही दुर्लभ है क्योंकि लकड़ी पाषाण मिश्रित मूर्तियां तांत्रिक देवी स्थापन का प्राचीन तरीका है।
• गर्भगृह हमेशा अंधकारमय होता है। तांत्रिक परंपरा के अनुसार शक्ति का निवास अंधकार में होता है इसलिए यहां रोशनी सीमित रखी गई है गर्भगृह में प्रवेश वाही भावना देता हैं।
• रथयात्रा के समय विमला देवी को विशेष महत्व मिलता है। रथ यात्रा केवल वैष्णव उत्सव नहीं है परंतु इसके पीछे शक्ति तत्व का भी प्राचीन रहस्य माना गया है। रथयात्रा की पूर्णता देवी के आशीर्वाद से ही होती है।
• यहाँ कालातीत ‘शाक्तवैष्णव समन्वय’ दिखाई देता है। भारत में बहुत कम जगह ऐसी है जहां पर शक्ति और वैष्णव दोनों परंपराएं एक ही परिसर में उत्तम रूप से मिलती हो।
• विमला देवी का एक प्राचीन अदृश्य कक्ष गुप्तकोष्ठ को बताया जाता है। पुरातन ग्रंथो में वर्णन है की देवी के गर्भगृह के पास एक गुप्त तांत्रिक कोष रहा है जहां केवल सिद्ध साधकों को प्रवेश मिलता था।
• पुरी में शक्ति पूजन का मूल केंद्र यही है ना कि कालीघाट या कामाख्या की तरह प्रसिद्ध परंतु पुरी की शक्ति परंपरा अपेक्षाकृत गुप्त रही है। आम भक्तों को इसका केवल बाहरी दर्शन मिलता है।
• देवी विमला को 10 महाविद्या के संयुक्त रूप में भी देखा जाता है। कई ओड़िशा तांत्रिक मानते हैं कि विमला देवी में तारा, भुवनेश्वरी, त्रिपुरसुंदरी, छिन्नमस्ता, घूमावती आदि के तत्व एक साथ विद्यमान है।
• एक समय में रात में श्री चक्र पूजन की परंपरा थी। प्राचीन परंपराओं में मां के गर्भगृह में श्री चक्र मंडल स्थापित कर रात्रि पूजा होती थी परंतु अब केवल कुछ प्रतीकात्मक विद्या जारी है।
• देवी विमला का महिषासुर पर्वत का रूप यहां विशेष माना जाता है। विमला देवी को “महिषमर्दिनी” का तांत्रिक रूप माना जाता है।गर्भगृह में उनका रूप इसी ऊर्जा का प्रतीक है।
ध्यान दें : विमला शक्ति पीठ के लिए कोई एक खास “ऑफिशियल वेबसाइट” नहीं है; इसके बजाय, यह ओडिशा के पुरी में बड़े श्री जगन्नाथ मंदिर कॉम्प्लेक्स में है, इसलिए इसकी जानकारी ऑफिशियल श्री जगन्नाथ मंदिर एडमिनिस्ट्रेशन वेबसाइट (www.shreejagannatha.in) पर मिल जाती है।