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Kamakhya Devi Mandir : कामाख्या देवी मंदिर के बारे में जानकारी, प्रसाद व्यवस्था, आरती, दर्शन का समय, नीति नियम और त्यौहार

कामाख्या देवी मंदिर इसे आप तांत्रिकों का मंदिर कहानी या मां सती की योनि का मंदिर बात तो एक ही है। इस ब्लॉग में आपको Kamakhya Devi Mandir से जुड़ी हर एक जानकारी मिल जाएगी जैसे की मंदिर का इतिहास मंदिर में चलने वाले कुछ अनोखे अनुष्ठान, मंदिर में क्यों मांसाहारी प्रसाद चढ़ाया जाता है? मंदिर के आसपास घूमने की जगह मंदिर पहुंचने का बेहतरीन समय। मंदिर से जुड़ी हर एक जानकारी के लिए इस ब्लॉग को पूरा पढ़ें।

कामाख्या देवी मंदिर के बारे में जानकारी

भारत में काला जादू करने वाले सबसे अधिक लोग ऐसा माना जाता है कि कोलकाता में रहते हैं परंतु भारत में काला जादू करने की राजधानी मियोंग को माना जाता है जो असम का एक छोटा सा गांव है। इसी वजह से असम में काला जादू से संबंधित कई सारी जगह है और उसमें से ही एक जगह है 51 शक्तिपीठों में से एक “कामाख्या देवी मंदिर”। कामाख्या देवी मंदिर असम की राजधानी दिसपुर के पास गुवाहाटी से 8 किलोमीटर दूर कामाख्या में है परंतु कामाख्या से भी 10 किलोमीटर की दूरी पर निलाचल पर्वत पर यह मंदिर स्थित है जिसे देवी सती का मंदिर माना जाता है।

यह मंदिर पहाड़ी पर स्थित होने के कारण इसका तांत्रिक गतिविधियों से संबंध होना आश्चर्य की बात नहीं है। यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में सर्वोच्च स्थान रखता है और यहीं पर भगवती की महामुद्रा स्थित है। ऐसा माना जाता है कि जो भी बाहर से आए भक्तगण जीवन में तीन बार इस मंदिर के दर्शन कर ले उनको सांसारिक भाव बंधन में से मुक्ति मिल जाती है।

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  • कात्यायनी शक्ति पीठ मंदिर : Click Here
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  • जेशोरेश्वरी काली मंदिर : Click Here
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कामाख्या देवी मंदिर का पौराणिक महत्व

अम्बूवाची पर्व के दौरान मां भगवती राजसविला होती है यानी की माता का मासिक धर्म शुरू होता है और मां भगवती की गर्भ गुरु स्थित महामुद्रा यानी की योनि तीर्थ से निरंतर तीन दिनों तक जल प्रवाह के स्थान से रक्त प्रवाहित होता है। कलयुग के समय में यह अपने आप में ही एक अद्भुत और अद्वितीय समय होता है इस बारे में कई सारी किताबों में लिखा गया है। साल का यह समय तांत्रिक गतिविधियां करने वाले लोगों के लिए किसी सुनहरे अवसर से काम नहीं है क्योंकि इन तीन दिनों तक वह कठिन साधना करते हैं।

“राजेश्वरी कामाख्या रहस्य” एवं “10 महाविद्याओं” नामक ग्रंथ के रचयिता एवं मां कामाख्या के अनन्य भक्त ज्योतिषी एवं वास्तु विशेषज्ञ डॉक्टर दिवाकर शर्मा ने इस बारे में खुलकर बात की थी। उन तीन दिनों के बाद मां भगवती की राजस्वला समाप्ति पर उनकी विशेष पूजा एवं साधना की जाती है। माता के बारे में कई सारी दंतकथाओं में से एक बेहद प्रचलित दंतकथा यह है कि घमंड में चूर असुर राज नरकासुर एक दिन मां भगवती कामाख्या को अपनी पत्नी के रूप में पानी का दुराग्रह कर बैठा था।

कामाख्या महामाया ने नरकासुर की मृत्यु को निकट मानकर उससे कहा कि यदि तुम इस रात में नील पर्वत पर चारों तरफ पत्थरों के चार सोपान पथो का निर्माण कर दो एवं कामाख्या मंदिर के साथ एक विश्राम गृह बनवा दो तो मैं तुम्हारी इच्छा अनुसार पत्नी बन जाऊंगी और यदि तुम ऐसा ना कर पाए तो तुम्हारी मौत निश्चित है। गर्भ में कर असुर ने पाठों के चारों सोपान प्रभात होने से पर्व पूर्ण कर दिए और विश्राम कक्ष का निर्माण कर ही रहा था कि महामाया के एक मायावी मुर्गी द्वारा रात्रि समाप्ति की सूचना दी गई जिससे नरकासुर ने क्रोधित होकर मुर्गी का पीछा किया और ब्रह्मपुत्र के दूसरे छोर पर जाकर उसका वध कर डाला।

यह स्थान आज भी “कुक्टाचकि” के नाम से प्रचलित है। उसके बाद मां भगवती की माया से भगवान विष्णु ने नरकासुर का वध किया उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र भगदत कामरूप का राजा बन गया। भगदत का वंश लुप्त हो जाने से कामरूप राज्य छोटे-छोटे भागों में बट गया और सामंत राजा कामरूप पर अपना शासन करने लगा। ऐसा माना जाता है कि नरकासुर के नीचे कार्यों के बाद एवं वशिष्ठ मुनि के अभिशाप से देवी प्रकट हो गई थी और कामदेव द्वारा प्रतिष्ठित कामाख्या मंदिर ध्वसंप्राय हो गया था।

दिवाकर शर्मा जी के अनुसार आद्या शक्ति मा भैरवी कामाख्या के दर्शन से पर्व महाभैरव उमानंद का दर्शन करना आवश्यक है जो की गुवाहाटी शहर के निकट ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य भाग में टपू के ऊपर स्थित है। यह एक प्राकृतिक शैलदिप है जो तंत्र का सर्वोच्च सिद्ध सती का शक्तिपीठ है इस टापू को मध्यांचल पर्वत के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यही पर समाधिस्थ सदाशिव को कामदेव ने कामबाण मार कर आहत किया था और समाधि से जागृत होने पर सदा शिव ने उसे भस्म कर दिया था। भगवती के महा तीर्थ नीलांचल पर्वत पर ही कामदेव को पुनः जीवनदान मिला था इसलिए ली यह क्षेत्र कामरूप के नाम से भी जाना जाता है।

कामाख्या देवी मंदिर में प्रसाद व्यवस्था

भारत में ज्यादातर ऐसे मंदिर है जहां प्रसाद शाकाहारी होता है लेकिन कुछ चुनिंदा मंदिर ऐसे हैं जहां पर मांसाहारी प्रसाद अर्पण किया जाता है‌। मां कामाख्या देवी मंदिर में भी प्रसाद शाकाहारी और मांसाहारी होता है। दोपहर 12:00 से 3:00 के बीच शाकाहारी प्रसाद में खिचड़ी खीर मिश्रित सब्जियां और पापड़ शामिल है। मंदिर के विशिष्ट समय पर बिना प्याज और लहसुन के बकरे का मांस और मछली का प्रसाद भी चढ़ाया जाता है, यह मंदिर तांत्रिक विद्या उसे जुड़ा है और इन विधाओं में पशुओं की बलि दी जाती है इसीलिए सदियों से मां कामाख्या को प्रसाद के रूप में मांसाहार दिया जाता है।

वार्षिक अंबुबाची उत्सव के बाद यानी की तीन दिनों का माता का मासिक खत्म होने के बाद उनको जी सफेद कपड़े से ढाका जाता है वह सफेद कपड़ा लाल हो जाता है जो माना जाता है कि उनके रक्त से ही होता है इसीलिए उस कपड़े को रक्तवस्त्र कहा जाता है और प्रसाद के रूप में हर एक भक्तगण को छोटे टुकड़े दिए जाते हैं। कभी कबार पुजारी द्वारा विशिष्ट मित्रों से अभिमंत्रित करने के बाद माता को सिंदूर चढ़ाया जाता है जिसे प्रसाद के रूप में भी बांटा जाता है।

कामाख्या देवी मंदिर में आरती और दर्शन का समय

मंदिर सुबह 5:30 के करीब खुलता है उसके बाद 6:00 बजे तक स्नान विधि होती है जिसमें मंदिर के गर्भ गृह परिसर को अच्छी तरीके से स्वच्छ किया जाता है। मंदिर सुबह 5:30 से 1:00 तक और दोपहर 2:30 से 5:30 बजे तक खुला रहता है। पहली आरती सुबह 5:30 से 6:30 के बीच और आखिरी आरती दोपहर 4:30 से 5:30 के बीच होती है। विशेष आरती का समय सुबह 6:30 से 7:00 और शाम को 5:30 से 6:00 के बीच में होता है यह समय मंदिर के पर्यावरण के अनुकूल बदला भी जा सकता है।

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कामाख्या देवी मंदिर के नीति नियम (Kamakhya Devi Mandir Rule)

मंदिर के कुछ प्रमुख और सख्त नियम है जिसमें से पहले है, ड्रेस कोड-शॉर्ट्स मिनी स्कर्ट आदि पहनना मना है। यहां मंदिर की मर्यादा बनी रहे ऐसे कपड़े पहनना आवश्यक है। मोबाइल फोन बंद रखना और निर्धारित स्थानों पर ही प्रसाद चढ़ाना जैसी चीजें यहां शामिल है। मंदिर के अंदर फोटोग्राफी सख्त वर्जित है और ऑनलाइन बुकिंग के लिए भक्तगण को अपनी मूल पहचान पत्र दिखाना आवश्यक है जाने से पहले मंदिर का समय देख लेना आवश्यक है क्योंकि विशिष्ट अनुष्ठान और कई त्योहारों की वजह से मंदिर के समय मैं बदलाव आ सकता है या फिर मंदिर बंद भी हो सकता है।

कामाख्या देवी मंदिर के त्यौहार (Kamakhya Temple Festival)

मुख्य रूप से मंदिर में कई सारे त्यौहार मनाए जाते हैं जैसे की

(1) अंबुबाची मेला

यह सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है जो हर साल जून में मनाया जाता है। यह देवी कामाख्या के वार्षिक मासिक धर्म का उत्सव है जिसे प्रजनन क्षमता का प्रतीक माना जाता है। मंदिर के द्वारा तीन दिनों के लिए बंद रहते हैं और चौथे दिन अनुष्ठान फिर से शुरू हो जाते हैं।

(2) दुर्गा पूजा

 यह प्रमुख त्योहार कामाख्या मंदिर परिसर में अनोखे अनुष्ठानों के साथ मनाया जाता है। कामाख्या मंदिर परिसर में किसी मूर्ति की पूजा नहीं की जाती बल्कि देवी के पीठ को साड़ियों और आभूषणों से भव्य रूप से सजाया जाता है और चंडी पाठ किया जाता है और हर दिन कुंवारी कन्याओं की पूजा की जाती है।

(3) मनशा पूजा

मनसा पूजा या नाग देवी और देबधन्नी की पूजा के दौरान मनाया जाने वाला यह उत्सव आदिवासी पूजा से निकटता से जुड़ा हुआ है। इस उत्सव के केंद्र में देबधन्नी हैं, नीलाचल पहाड़ियों के विभिन्न देवताओं द्वारा आविष्ट गैर-ब्राह्मण पुरुष दिव्य शक्ति के वाहक बन जाते हैं। कई दिनों तक, प्रत्येक देवता एक विशेष देवता द्वारा आविष्ट रहता है। वे तीन दिनों तक (अपने आविष्ट काल के अंतिम दिनों में) बिना किसी विश्राम के समाधि अवस्था में नृत्य करते हैं, और तलवारों की धारदार धारों पर नंगे पैर नृत्य जैसे अविश्वसनीय करतब दिखाते हैं। देवताओं के जीवित वाहनों के दर्शन और आशीर्वाद पाने के लिए हजारों भक्त इसमें शामिल होते हैं।

(4) राजा राजेश्वरी पूजा

वसंत नवरात्रि के दौरान मनाया जाने वाला राज राजेश्वरी पूजा कामाख्या के कुलाचार तंत्र मार्ग के साधक पुरुषों और महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। परिसर के आसपास के मंदिरों में विस्तृत पूजा का आयोजन और निजी तौर पर अनुष्ठान किया जाता है, और गैर-दीक्षितों को इसमें प्रवेश या भाग लेने की अनुमति नहीं है।

  • पोहन बिया: यह देवी कामाख्या का प्रतीकात्मक विवाह समारोह है, जो दिसंबर/जनवरी में होता है।
  • वसंती पूजा: मार्च/अप्रैल में मनाया जाने वाला एक वसंत उत्सव।
  • हलखता: अप्रैल में मनाया जाने वाला असमिया नव वर्ष।
  • गोपाल दौल: मार्च में मनाया जाने वाला होली उत्सव।
  • महाशिवरात्रि: फरवरी/मार्च में मनाया जाता है।
  • सरस्वती पूजा: जनवरी/फरवरी में मनाया जाता है।

कामाख्या देवी मंदिर के आसपास घूमने की जगह

गुवाहाटी में कामाख्या देवी मंदिर के पास, आप परिसर के भीतर अन्य मंदिरों के दर्शन कर सकते हैं, सुंदर नीलाचल पहाड़ियों की खोज कर सकते हैं और शहर के अन्य आस-पास के आकर्षणों की खोज कर सकते हैं। विशिष्ट दर्शनीय स्थलों में कामाख्या मंदिर परिसर के भीतर विभिन्न दशमहाविद्या मंदिर और भगवान शिव को समर्पित मंदिर शामिल हैं।

1. महाकाली मंदिर:

महाकाली को साधना की प्रमुख देवी माना जाता है। देवी का यह रूप श्याम वर्ण, बिखरे बालों और कटे हुए मानव सिरों की माला धारण किए हुए है। वे अपने बाएँ हाथ में एक कटा हुआ मानव सिर और एक खड्ग (एक बड़ा सा हथियार) तथा दाएँ हाथ में बरमुद्रा धारण करती हैं। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र है। महाकाली के प्रमुख रूप दक्षिणकाली, गुज्यकाली, भद्रकाली, शशांकली और महाकालभैरवी हैं। दक्षिणकाली अधिष्ठात्री देवी हैं जो शनि ग्रह को नियंत्रित करती हैं। इसलिए शनिवार को उनकी पूजा की जाती है।

 2. तारा देवी मंदिर:

तारा देवी ‘बक-शक्ति’ अर्थात् वाणी की शक्ति प्रदान करती हैं। इन्हें ‘नील सरस्वती’ भी कहा जाता है। देवी गौर वर्ण, तीन नेत्रों और चार भुजाओं वाली हैं। इनके हाथ में एक खड़ग, एक कार्तरीका, एक कटा हुआ मानव सिर और एक कुमुदिनी है। ये मानव सिरों की माला धारण करती हैं और व्याघ्र चर्म धारण करती हैं। तारा देवी को चिता पर खड़ी हुई दिखाया गया है।

माया तंत्र के अनुसार, तारा देवी के आठ रूप हैं: तारा, उर्गा, मोहग्रा, बज्र, नीला, सरस्वती, कामेश्वरी और भद्रकाली। प्रार्थना करने पर ये संकटग्रस्त लोगों की सहायता करती हैं और इसीलिए इन्हें ‘तारा’ कहा जाता है। नीलाचल पर्वत पर स्थित तारा मंदिर महाकाली और कामाख्या मंदिर के बीच स्थित है।  तारा गुरु बृहस्पति (गुरुवार) की अधिष्ठात्री देवी हैं और उन्हें मार्गदर्शन और सुरक्षा प्रदान करने वाली देवी माना जाता है तथा वह मोक्ष की ओर ले जाने वाला परम ज्ञान प्रदान करती हैं।

3. भैरवी:

देवी की त्वचा का रंग प्रातःकालीन सूर्य के समान है।  वह लाल वस्त्र पहने हुए हैं।  अपने चार हाथों में वह एक बोर्डा (बड़ी छुरी), एक पुश्तक (पुस्तक) और जपमाला (प्रार्थना माला) लेती है और चौथा हाथ अभयमुद्रा मुद्रा में है। उनके पास मानव मुंडों की माला भी है, उनकी आंखें लाल कमल के समान चमकीली हैं।  देवी भैरवी के 13 अलग-अलग रूप हैं:

  •  त्रिपुरभैरवी
  •  संपदप्रदा भैरवी
  •  कौलेश भैरवी
  •  चैतन्य भैरवी
  •  कामेश्वरी भैरवी
  •  कामेश्वरी भैरवी
  •  सतकुटा भैरवी
  •  नित्या भैरवी
  •  रूद्रभैरवी
  •  भुवनेश्‍वरी भैरवी
  •  त्रिपुरबाला भैरवी
  •  भैबिद्धांगशिनी भैरवी

4. छिन्नमस्ता देवी:

छिन्नमस्ता देवी सिरविहीन हैं और भयावह रूप में हैं। उनका कटा हुआ सिर उनके बगल में रखा है। उन्हें अपनी गर्दन से निकलते रक्त को पीते हुए दिखाया गया है। उनके बाल अनुशासित रूप से बंधे नहीं हैं। वह अपने हाथों में मानव सिर और हथियार धारण करती हैं। वह भी मानव सिरों की माला पहनती हैं और उनका बायां पैर आगे की ओर है। इसके अलावा, देवी मदन (काम) और रति पर खड़ी दिखाई देती हैं जो आलिंगन में बंधे हैं।

देवी की मुख्य सहयोगी बोर्निनी और डाकिनी पास में हैं और देवी की गर्दन से फव्वारे की तरह रक्त निकल रहा है। छिन्नमस्ता देवी राहु (बुधवार) की अधिष्ठात्री देवी हैं। नीलाचल पर्वत का यह मंदिर कामेश्वर मंदिर से सटा हुआ है और यहां केवल खड़ी और संकरी सीढ़ियों के माध्यम से पहुंचा जा सकता है।

5. धूमावती:

देवी का रंग गोरा, लंबी, चंचल और मलिन वस्त्र धारण करने वाली है। वह विधवा रूप में हैं। उनके नेत्र रूखीय हैं और उनके तीन हाथों में शस्त्र हैं, जबकि चौथा हाथ वरमुद्रा में है।

उनकी बड़ी, कुरूप नाक और भयानक रूप है। धूमावती देवी केतु (गुरुवार) की अधिष्ठात्री देवी हैं। इस विधवा देवी का रंग स्वाभाविक रूप से श्वेत है।

6. मातांगी और कमाला:

वे माँ कामाख्या का मुख्य स्वरूप हैं और सभी जीवों का कल्याण सुनिश्चित करती हैं। देवी का तेज नए सूर्य के समान है। वे अपने चार हाथों में धनुष, बाण, रस्सी और कंदील धारण करती हैं। वे महाकाल की गोद में विराजमान हैं और प्रसन्न एवं तृप्त मन की अवस्था में हैं।

7. भुवनेश्वरी देवी:

भुवनेश्वरी देवी की त्वचा का रंग भोर के समय सूर्य की किरणों के समान है। उनके माथे पर अर्धचंद्र है और उनकी तीन आँखें हैं। चार भुजाओं में से दो में वे भाला और कमंद धारण करती हैं, जबकि अन्य दो हाथ बरमुद्रा और अभयमुद्रा में हैं। भुवनेश्वरी मंदिर नीलाचल पर्वत के सबसे ऊँचे स्थान, 690 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। पुराणों के अनुसार भुवनेश्वरी मंदिर ब्रह्म पर्वत की चोटी पर स्थित है, इसलिए नीलाचल पर्वत कोई और नहीं बल्कि ब्रह्म पर्वत ही है। देवी ब्रह्माण्ड की माता हैं जिनका शरीर ब्रह्मांड है। वैवाहिक समस्याओं से ग्रस्त निःसंतान दम्पतियों को देवी से वरदान मिलता है, जो शुक्र (शुक्रवार) की अधिष्ठात्री देवी हैं।

8. नीलाचल पहाड़ियाँ:

कामाख्या मंदिर नीलाचल पहाड़ियों पर स्थित है और आसपास का परिदृश्य मनोरम दृश्य और चिंतन के लिए एक शांतिपूर्ण वातावरण प्रदान करता है, जैसा कि इस गूगल उपयोगकर्ता समीक्षा और एक अन्य गूगल उपयोगकर्ता समीक्षा में बताया गया है।

कामाख्या देवी मंदिर जाने का बेहतरीन समय

आमतौर पर, कामाख्या देवी मंदिर जाने का आदर्श समय अक्टूबर से अप्रैल के महीनों तक होता है। इस दौरान मौसम सुहावना होता है, जो इसे आध्यात्मिक शांति के लिए एक शांत स्थान बनाता है। मंदिर में दर्शन के लिए सबसे अच्छा समय अंबुबाची मेले के दौरान होता है, जो जून के महीने में मनाया जाने वाला चार दिवसीय उत्सव है। इस पोस्ट में, आप जानेंगे कि एक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव के लिए मंदिर तक आसानी से कैसे पहुँचा जाए।

कामाख्या देवी मंदिर पहुंचने की सुविधा

कामाख्या देवी मंदिर के दर्शन के लिए, आप गुवाहाटी स्थित लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे (GAU) के लिए हवाई मार्ग से जा सकते हैं या गुवाहाटी या कामाख्या रेलवे स्टेशनों पर पहुँच सकते हैं। हवाई अड्डे या स्टेशनों से, आप असम के गुवाहाटी में स्थित मंदिर तक टैक्सी, बस या कैब ले सकते हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन कामाख्या (6.8 किमी) और गुवाहाटी (8.3 किमी) हैं।

हवाई मार्ग

निकटतम हवाई अड्डा: लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (GAU), जो गुवाहाटी में है।

हवाई अड्डे से: मंदिर तक पहुँचने के लिए टैक्सी, कैब या बस किराए पर लें।

रेलगाड़ी द्वारा

निकटतम स्टेशन: दो निकटतम रेलवे स्टेशन कामाख्या (6.8 किमी) और गुवाहाटी (8.3 किमी) हैं।

स्टेशन से: आप मंदिर तक टैक्सी या बस ले सकते हैं।

सड़क मार्ग से:

अन्य शहरों से: आप सड़क मार्ग से बस या कार से गुवाहाटी जा सकते हैं।

 गुवाहाटी के भीतर: शहर के अन्य हिस्सों से मंदिर तक जाने के लिए स्थानीय बसों या टैक्सियों का उपयोग करें।

कामाख्या देवी मंदिर के आसपास रहने और खाने की व्यवस्था:

मंदिर के आसपास कई सारी होटल और आश्रम स्थित है जहां पर आप अच्छी सुविधा का खाना और अपनी अनुकूलता के अनुसार रहना पसंद कर सकते हैं।

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