हनुमान न्यूज़ में आपका स्वागत है। यहां पर आपको चामुंडेश्वरी मंदिर से जुड़ी हर जानकारी मिलेगी जैसे की मंदिर का इतिहास, उसकी वास्तुकला, उसकी परंपराएं, उसकी पूजा विधि, आरती और दर्शन का समय, आसपास घूमने की अच्छी जगह और भी बहुत कुछ।
चामुंडेश्वरी मंदिर के बारे में जानकारी
कर्नाटक के मैसूर शहर की चामुंडी पहाड़ी पर स्थित चामुंडेश्वरी मंदिर दक्षिण भारत का अत्यंत प्राचीन और प्रसिद्ध शक्ति पीठ माना जाता है। यह मंदिर देवी चामुंडेश्वरी (जिसे देवी दुर्गा का उग्र रूप कहते हैं) को समर्पित है, जिन्हें महिषासुर मर्दिनी भी कहा जाता है क्योंकि देवी ने यहीं पर असुर महिषासुर का वध किया था। यह स्थान अष्टदश शक्ति पीठों में से एक के रूप में आदरपूर्वक माना जाता है, जहाँ मान्यता है कि माता सती का केश भाग यहाँ पृथ्वी पर गिरा था। हजारों वर्षों से यह स्थान तांत्रिक शाक्त परंपराओं, प्राचीन अनुष्ठानों, और मैसूर साम्राज्य की राजपरंपरा का मुख्य केंद्र रहा है।
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चामुंडेश्वरी मंदिर का इतिहास (History of Chamundeshwari Temple)
6 वीं से 10 वीं शताब्दी के दौरान यह स्थान चामुंडी देवी यानी की काली दुर्गा का उग्र रूप का एक साधना केंद्र रहा है। सबसे पुराने शिलालेख और ताम्र पत्र बताते हैं की 6-10 वीं शताब्दी में यहां एक छोटी गुफा और लकड़ी का छोटा मंदिर था। माना जाता है कि इसे गंगैय राजवंश के शासको ने एक साधारण देवी स्थल के रूप में स्थापित किया था।
उस समय देवी को चामुंडा के नाम से पूजा जाता था। 10वीं से 12वीं शताब्दी में होयसला काल के दौरान मंदिर का पहला पुनः निर्माण किया गया। होयसला राजाओं ने मंदिर को पहले स्थाई आकार दिया। पत्थर का गर्भगृह, स्तंभ और देवी की उग्र प्रतिमा इसी काल की मानी जाती है। यह समय चामुंडी पर्वत को शौक तांत्रिक साधना स्थल के रूप में प्रसिद्ध करने वाला दौर था।
14वीं-16वीं शताब्दी के दौरान विजयनगर साम्राज्य ने मंदिर का विस्तार किया। विजयनगर सम्राटों ने दक्षिण भारत में शक्ति परंपरा को बल दिया। इसी कल के दौरान चामुंडी पर्वत पर नक्काशीदार मंडप, बड़े पुजारी आवास और पूजा-व्यवस्था बनाई गई। देवी को “चामुंडेश्वरी” नाम इसी समय से राज्य देवी के रूप में प्राप्त हुआ। 17वीं शताब्दी को मंदिर का स्वर्ण काल माना जाता है क्योंकि उस समय वाडियार राजवंश वहां पर राज करते थे। यह मंदिर आज जिस रूप में प्रसिद्ध है, वह मुख्यतः मैसूर के वाडियार राजाओं की देन है।
वर्ष 1659 के दौरान मैसूर के राजा राज वाडियार ने मंदिर को एक विशाल द्रविड़ीय शैली का रूप दिया। पहले का छोटा होयसला मंदिर पुनर्निर्मित कर भव्य पत्थर का गर्भगृह और प्रमुख सभा मंडप का निर्माण कराया। देवी चामुंडेश्वरी को मैसूर साम्राज्य की कुलदेवी घोषित किया गया क्योंकि राज वाडियार ने विजयनगर से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद देवी को अपना ईश्वरीय प्रतिनिधि और राज्य की रक्षक देवी माना था।
1650 से 1750 के दौरान चामुंडी हिल पर “महिषासुर मूर्ति” मूर्ति बनाई गई। कहा जाता है कि यहाँ असुर महिषासुर का वध माता चामुंडा ने कियाथा इसी कारण मैसूर का नाम पड़ा महिषापुरा या फिर मैसूर। बाद के वाडियार शासकों ने हल्दी नारंगी रंग की विशाल महिषासुर की मूर्ति स्थापित की, जो आज इसकी पहचान है। वर्ष 1799 1868 के दौरान महाराजा कृष्णराज वाडियार III ने 1000 सीढ़ियों का निर्माण करवाया। 1827 में 1008 सीढ़ियों का बड़ा निर्माण कराया गया था। पर्वत चढ़ने का यह मार्ग आज भी सबसे प्रसिद्ध मार्ग है। इसी काल में मंदिर के त्योहारों, विशेषकर दशहरा पर्व को सरकारी संरक्षण मिला।
साल 1930 से 1970 महाराजा जयचामराज वाडियार ने आधुनिक विस्तार किया। मुख्य गोपुरम का विस्तार, सोने की परत चढ़ी सजावट, और तलहटी पर विशेष मंडप बनाए गए थे। देवी के रथ, जुलूस और दशहरा उत्सव को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई थी। स्वतंत्रता के बाद मंदिर व कर्नाटक सरकार द्वारा संयुक्त रूप से देखरेख की व्यवस्था बनी। पहाड़ी सड़क, यात्री ढांचे, पार्किंग, रेस्टरूम, और इलेक्ट्रिक वाहनों के मार्ग बनाए गए। 2008 से 2020 के बीच मंदिर परिसर का आधुनिकीकरण और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया गया। आज इस शक्ति पीठ को हर वर्ष 50 लाख से अधिक भक्त दर्शन करते हैं।
चामुंडेश्वरी मंदिर की वास्तुकला
चामुंडेश्वरी मंदिर का निर्माण द्रविड़ीय शैली में हुआ है, जिसमें ऊँचे गोपुरम, गहरे गर्भगृह, विस्तृत मंडप और नक्काशीदार स्तंभ मुख्य विशेषताएँ हैं। मंदिर की वास्तुकला 6वीं से 20वीं शताब्दी तक कई चरणों में विकसित हुई है।
मुख्य गोपुरम जो द्रविड़ीय शैली की पहचान है
मंदिर का मुख्य प्रवेशद्वार एक 7 स्तरीय ऊँचा गोपुरम है। इस गोपुरम पर देवी देवताओं, यौद्धाओं, लोक चरित्रों और शाक्त प्रतीकों की जटिल नक्काशी की गई है। हर मंज़िल धीरे धीरे संकरा होती जाती है। यह द्रविड़ीय शैली की प्रमुख विशेषता है। सबसे ऊपर “कलश” लगाया गया है, जो सोने जैसी चमक लिए है। गोपुरम का रंग हल्का पीला है, मैसूर परंपरा का प्रतीक है।
द्वारपाल और शाक्त प्रतीक
मुख्य द्वार के दोनों ओर विशाल द्वारपाल की प्रतिमाएँ हैं। ये देवी के उग्र रूप की रक्षा संस्कृति को दर्शाती हैं। ऊपर के हिस्सों में महिषासुर मर्दिनी की कई आकृतियाँ हैं, जो संदेश देती हैं कि यह देवी उग्र शक्ति का स्थान है।
विशाल स्तंभ मंडप
यह गोपुरम के बाद एक बड़ा सभामंडप है जिसमें 30+ नक्काशीदार ग्रेनाइट स्तंभ है, होयसला और वाडियार शैली का सम्मिश्रण है। स्तंभों पर शेर, नाग, कमल, और देवी के विभिन्न रूपों की आकृतियाँ बनाई गई है। यहीं बड़े पर्वों और अनुष्ठानों का आयोजन होता है। मंडप का फर्श पुरानी काली चट्टानों से बना है जो कई जगहों पर चमकदार हो चुका है।
कोर मंडप: गर्भगृह प्रवेश मंडप
गर्भगृह से पहले एक छोटा अंतराल मंडप है। यहाँ से देवी की ऊर्जा अधिक तीव्र महसूस होती है। होयसला की पुरानी मूर्तिकला यहाँ साफ दिखाई देती है।
गर्भगृह जिसे मंदिर का हृदय कहा जाता है
यह वास्तुकला का सबसे महत्वपूर्ण और प्राचीन भाग है। गर्भगृह की विशेषताएँ कुछ इस प्रकार है कि बहुत गहरा और छोटा, ऐसा कि प्रकाश कम प्रवेश करता है। पूरी दीवारें मोटे ग्रेनाइट से बनी है। 6वीं 10वीं सदी की शैली में बना है। यहाँ स्थित देवी की अष्टभुजा चामुंडेश्वरी की प्रतिमा है। यह काले पत्थर पर निर्मित है। हथियारों के साथ उग्र मुद्रा बना है साथ ही शिखर पर चांदी/सोने की सजावट की गई है। प्रतिमा के पीछे “त्रिशूल, खड़्ग और कटार” के प्राचीन चिह्न है।
प्राकार-मंदिर का घेऱा
मंदिर के चारों ओर बड़ी दीवारें हैं। दक्षिण भारत के सभी बड़े शक्ति पीठों में मंदिर को घेरे से सुरक्षित रखने का नियम है। प्राकार के अंदर छोटे देवालय हैं जहां पर भैरव, गणपति, काली, नवदुर्गा और नागदेवता बनाए गए हैं।
सोने का वाह्न और रथ
चामुंडेश्वरी देवी का विशेष सोने से मढ़ा हौदा बना है। दशहरा के दौरान देवी इसी पर विराजती हैं। यह भी मंदिर की कलात्मक संपत्ति का हिस्सा है।
मंदिर तक पहुँचने वाली 1000+ सीढ़ियाँ
चामुंडी हिल पर जाने वाली 1008 सीढ़ियाँ वाडियार राजाओं द्वारा 1827 में बनवाई गईं थीं। इन सीढ़ियों के दोनों ओर नक्काशीदार स्तंभ और छोटे छोटे श्राइन बने हैं, इन्हें भी वास्तुकला का अंग माना जाता है।
परिसर से दृश्य और पर्वत संरचना
पहाड़ी पर स्थित होने के कारण मंदिर “पर्वतीय द्रविड़ीय” शैली का अनूठा मिश्रण बन गया है। मंदिर परिसर से मैसूर पैलेस और पूरा मैसूर शहर दिखाई देता है। यह दृश्य भी मंदिर की पहचान का हिस्सा माना जाता है।
चामुंडेश्वरी मंदिर से जुड़ी हुई लोक कथाएं:
• देवी चामुंडी का प्रकट होना;श्मशान में साधना करने वाले सिद्ध के बारे में:
एक प्रचलित लोक कथा के अनुसार पहाड़ी पर सदियों पहले एक सिद्ध योगी कठोर तंत्र साधना कर रहे थे। साधना के 41वें दिन रात के विरह समय में देवी स्वयं उनके सामने प्रकट हुईं। योगी ने उनसे “इस भूमि का रक्षण” करने का वर माँगा। देवी ने वचन दिया कि “जहाँ मेरे चरण पड़े, वह भूमि कभी अशुभ नहीं होगी।” इसी के बाद पहाड़ी को “चामुंडी की पावन भूमि” कहा गया।
• देवी का रूप “स्वयंभू”
कई स्थानीय जनजातियों की कथा है कि हजारों वर्ष पहले पहाड़ी पर एक काले पत्थर की आकृति मिली थी। यह प्राकृतिक चट्टान थी, लेकिन उसमें चामुंडा का चेहरा, हथियार और आकृति स्पष्ट थी। लोगों ने माना कि देवी स्वयं प्रकट हुई हैं। आज की प्रतिमा उसी स्वयंभू रूप का ही विकसित और पूजित स्वरूप मानी जाती है।
• रात में “नाद सुनाई देना”
पहाड़ी पर रहने वाले स्थानीय लोग बताते हैं कि पुराने समय में चामुंडी पहाड़ी से रात में घंटे और झांझ की मंद आवाजें सुनी जाती थीं। कहा जाता था कि यह देवी की सेना पहाड़ की परिक्रमा करती हैं। आज भी कई लोग इसे “चामुंडी का रात्रि नाद” कहते हैं। यह कथा तांत्रिक और शाक्त परंपरा से जुड़ी है।
• देवी वाडियार राजाओं की “रक्षक” बन गईं
लोक कथा के अनुसार वाडियार राजा एक बार शत्रुओं से घिर गए थे।राजा ने पहाड़ी पर माँ से प्रार्थना की, “यदि राज्य बचे तो तुम्हें इस भूमि की अधिष्ठाता देवी बनाऊंगा।” कहा जाता है कि उसी रात आंधी तूफान उठा और शत्रु सेना पीछे हट गई। तब से देवी वाडियारों की कुल देवी बनीं, और मंदिर का भव्य रूप भी इसी कारण बनाया गया।
• चामुंडी देवी “पहाड़ी की राख” से भक्तों की रक्षा करती हैं
एक ग्रामीण कथा है पहाड़ी की मिट्टी का रंग गहरा काला है। लोग मानते हैं कि यह रंग देवी के उग्र रूप और महिषासुर के रक्त का प्रतीक है। इसलिए पहाड़ी की “काली राख” को लोग बुरी शक्तियों से रक्षा के लिए घर में रखते हैं। यह लोक मान्यता आज भी कई परिवारों में जीवित है।
चामुंडेश्वरी मंदिर में प्रसाद व्यवस्था
- मंदिर में मुख्य प्रसाद लड्डू, पोंगल, नारियल, चूरम, और कुंकुम हल्दी के पैकेट के रूप में मिलता है।
- प्रसाद मंदिर प्रशासन द्वारा स्वच्छ रसोई में तैयार किया जाता है।
- भक्तों को प्रसाद लाइन में दर्शन के बाद वितरित किया जाता है।
- लड्डू और पैक्ड प्रसाद टिकट काउंट भवन से भी खरीदा जा सकता है।
- बड़े पर्व जैसे दशहरा पर विशेष महाप्रसाद मिलता है और अतिरिक्त काउंटर खुलते हैं।
- प्रसाद की कीमतें कम और सरकारी तय होती हैं कहीं मनमानी नहीं।
- VIP दर्शन वालों के लिए भी प्रसाद वही मिलता है, कोई अलग प्रकार नहीं है।
चामुंडेश्वरी मंदिर आरती और दर्शन का समय
चामुंडेश्वरी मंदिर दर्शन समय
- सुबह: 5:00 बजे से 1:30 बजे
- दोपहर: 3:00 बजे से 6:00 बजे
- शाम: 7:30 बजे से 9:00 बजे
चामुंडेश्वरी मंदिर पूजा समय
- सुप्रभात पूजा: 5:30 AM
- अभिषेक व अलंकार: 6:00–7:30 AM
- महामंगल आरती: 12:00 PM
- संध्या आरती: 7:30 PM
- त्योहारों पर समय थोड़ा बढ़ जाता है।
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चामुंडेश्वरी मंदिर के नियम
- मोबाइल से फोटोग्राफी गर्भगृह के अंदर निषिद्ध है।
- मंदिर में अनुकूल हो वैसे वस्त्र पहनना अनिवार्य है।
- गर्भगृह में चढ़ावा हाथ में लेकर प्रवेश नहीं कर सकते।
- धूम्रपान, शराब, चमड़े की वस्तुएँ प्रतिबंधित है
- पंक्तियों में शांति से खड़े रहना अनिवार्य है और VIP लाइन अलग है।
- प्रसाद/लड्डू केवल अधिकृत काउंटर से ही लें।
चामुंडेश्वरी मंदिर में पूजा अर्चना
प्रतिदिन देवी की तीन मुख्य आरती और पूजा होती है सर्वप्रथम सुप्रभात सेवा। यह प्रातः दरवाजे खुलते ही देवी को जगाने की विधि होती है जिसमें शंखनाद मंत्रोचार करके फूलों के साथ होने वाली पूजा है। उसके बाद अभिषेकम होता है जहां पर देवी की प्रतिमा पर दूध दही शहद घी और पवित्र जल से स्नान करवाया जाता है और बाद में अलंकृत दर्शन का समय होता है जहां अभिषेक के बाद देवी को रेशमी वस्त्र चंदन कुमकुम और फूलों से विशेष रूप से सजाया जाता है।
विशेष पूजा में कुमकुम अर्चना जहां पर पुजारी देवी के नाम पर 108 बार स्तुति मंत्र पढ़ते हैं साथ ही कुमकुम और अक्षत चढ़ाए जाते हैं। सहस्त्रनाम अर्चना यहां पर देवी के हजार नाम से युक्त विशेष पाठ किए जाते हैं। यह मुख्य रूप से मानसिक शांति और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए लोकप्रिय हैं। उसके बाद तृषित अर्चना की जाती है जहां पर 300 नाम का पाठ और फूल चढ़ाने की विधि होती है।
चामुंडेश्वरी मंदिर के आसपास घूमने की जगह
चामुंडेश्वरी मंदिर के आसपास घूमने की जगह निम्नलिखित है:
1. महिषासुर की विशाल मूर्ति
मंदिर से केवल कुछ ही कदम की दूरी पर चामुंडा हिल का सबसे प्रसिद्ध फोटो प्वाइंट है जिसे महिषासुर की विशाल मूर्ति कहा जाता है लगभग 15 फीट की ऊंची रंगीन मूर्ति हाथ में तलवार और नाग के साथ यह मूर्ति खड़ी है। माना जाता है कि इस स्थान पर देवी चामुंडेश्वरी ने महिषासुर का वध किया था। यहां से नीचे मैसूर शहर का खूबसूरत नजारा दिखता है।
2. नंदी मंदिर
यह मंदिर से तकरीबन 1 किलोमीटर की दूरी पर 350 साल पुरानी एक ही पत्थर से बनी विशाल नंदी की प्रतिमा है। लगभग 16 फीट ऊंची दक्षिण भारत की सबसे बड़ी मूर्तियां में से एक इसे माना जाता है। आसपास पेड़ों की छाया शांत वातावरण सीढ़ियां चढ़ने वालें लिए मन को ताजगी देने वाला यह स्थान है। नदी के पास से पूरे मैसूर की पर्वतमाला दिखाई देती है।
3. चामुंडी हिल व्यू प्वाइंट
यह मंदिर के आसपास ही कई व्यू प्वाइंट्स हैं जहां से पूरा मैसूर शहर, पैलेस, स्टेडियम झिले जैसी कई सारी चीजे दिखाई देती है। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय यहां पर दृश्य बेहद खूबसूरत और घाटियों में धुंध की हल्की की परत दिखाई देती है। यहां से मैसूर पैलेस रात में रोशनी में चमकता हुआ दिखता है।
4. मैसूर पैलेस
मंदिर से लगभग 13 से 14 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण भारत का सबसे भव्य महल वाडियार राजवंश का शाही निवास स्थान है। अंदर का सोने का सिंहासन, रंगीन ग्लास, नक्काशीदार दरबार और कर्नाटक की शिल्पकला देखने योग्य यह बेहतरीन स्थान है। त्योहार की रात को पूरा महल लाखों बल्बों से जगमगाता है और यह दुनिया की सबसे सुंदर लाइटिंग में से एक है।
5. मैसूर चिड़ियाघर
मंदिर से तकरीबन 12 किलोमीटर की दूरी पर एशिया के सबसे पुराने और सबसे सुंदर चिड़ियाघरों में से एक है। यहां पर वास्तविक प्राकृतिक वातावरण में सिंह, बाघ, हाथी, जिराफ और सफारी मार्ग आदि कई सारी चीजे मौजूद हैं। परिवार के साथ घूमने के लिए यह बेहतरीन स्थान है।
6. करंजी झील
मंदिर से तकरीबन 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह झील और उसके के बीच सुंदर रास्ते बर्ड हाउस और बटरफ्लाई पार्क जैसी कई सारी चीज हैं। पक्षियों की 170 से भी ज्यादा प्रजातियां और फोटोग्राफी पसंद करने वाले लोगों के लिए यह बेहतरीन स्थान है। झील के किनारे शांत बैठने की व्यवस्था भी है जहां पर आप कुछ समय शांति से बिता सकते हैं।
7. सेंट फिलोमेना चर्च
मंदिर से तकरीबन 14 किलोमीटर की दूरी पर गोथिक शैली में बना दक्षिण भारत का सबसे ऊंचे चर्चा में से एक यह चर्च है। अंदर की कांच की नक्काशी लंबी ऊंची छते और यूरोपियन वास्तु कला का यह अद्भुत मिश्रण है। रात की रोशनी में यह देखने लायक स्थल है।
8. जगनमोहन पैलेस और कलादर्शनी
यह मंदिर से तकरीबन 13 किलोमीटर की दूरी पर मैसूर राजाओं की कला संपदा, चित्रकला, हस्तशिल्प और प्राचीन मूर्तियों का बेहतरीन संग्रह है। यहां पर राजा रवि वर्मा की मूल पेंटिंग्स भी है। इतिहास और कला में रुचि रखने वालों के लिए यह अद्भुत स्थान है।
9. ब्रिंदावन गार्डन्स
यह मंदिर से तकरीबन 20 किलोमीटर की दूरी पर चामुंडी हिल के बाद शाम के समय बिताने का सबसे अच्छा स्थल है। यहां पर फाउंटेन शो, संगीत के साथ चलते पानी के रंग बिरंगी फव्वारे का अद्भुत नजारा आपको मिलेगा। विशाल बगीचे, झील और नदी के किनारे टहलने की यह एक खूबसूरत जगह है।
10. मेलोडी वर्ल्ड म्यूजियम
यह मंदिर से तकरीबन 12 किलोमीटर की दूरी पर मॉम से बनी जीवन जैसी प्रतिमाएं और संगीत थीम पर आधारित एक बेहतरीन म्यूजियम है यहां पर बच्चों वह परिवार के साथ घूमने के लिए आप जरूर से जा सकते हैं।
चामुंडेश्वरी मंदिर कहां पर स्थित है?
- स्थान: चामुंडी हिल, मैसूर, कर्नाटक
- ऊँचाई: समुद्र तल से लगभग 1000 मीटर
- मैसूर पैलेस से दूरी: 13-14 किमी
- बेंगलुरु से दूरी: 145 किमी
चामुंडेश्वरी मंदिर जाने की सुविधा
1 सड़क सुविधा: मैसूर शहर से मंदिर तक सीधी सड़क है और 13 किमी की दूरी है।
2. बस सुविधा: मैसूर बस स्टैंड से हर 15–20 मिनट में चामुंडी पहाड़ी के लिए सरकारी बसें उपलब्ध।
3. भारत के किसी भी शहर से आप मैसूर के लिए ट्रेन या फिर हवाई जहाज ले सकते हैं।
चामुंडेश्वरी मंदिर जाने का बेहतरीन समय
मंदिर जाने के लिए सबसे बेहतरीन दो समय है। सर्वप्रथम तो अक्टूबर से फरवरी का समय क्योंकि इस समय ठंडा मौसम और साफ दृश्य आपको मिलेंगे। साथ ही आप त्योहारों के समय मंदिर में जा सकते हैं जिसकी वजह से आपको बेहद ही आध्यात्मिक अनुभव होगा।
चामुंडेश्वरी मंदिर के त्यौहार
1. नवरात्रि एवं दशहरा
यह मंदिर का सबसे महत्वपूर्ण और भव्य उत्सव माना जाता है। नौ दिनों तक देवी चामुंडेश्वरी के अलग अलग अलंकृत रूपों का विशेष दर्शन होते हैं। दुर्गा सप्तशती पाठ, महाअभिषेक और विशेष अर्चना होती है। मैसूर दशहरा का मुख्य केंद्र देवी ही मानी जाती हैं कुछ इसी वजह से राज परिवार द्वारा पूजा होती है।
2. अमावस्या और चतुर्दशी पूजा
हर अमावस्या पर विशेष काली/चामुंडी रूप की पूजा की जाती है रात्रि समय विशेष तांत्रिक परंपराओं से जुड़ा छोटा अनुष्ठान भी होता है परंतु यह सार्वजनिक नहीं है। भक्तों के लिए कुमकुम अर्चना और दीपदान का भी बेहद महत्व है।
3. महाशिवरात्रि
चामुंडी माता शिव की शक्ति मानी जाती हैं, इसलिए यह दिन विशेष रूप से पूजा जाता है। पूरी रात जगरण, स्तुति पाठ और विशेष अर्चना की जाती है। भक्तों की बड़ी भीड़ और अतिरिक्त दर्शन व्यवस्था होती है।
4. आशाढ़ शुक्रवार
यह कर्नाटक में शक्ति उपासना का विशेष समय है। पूरे आशाढ़ मास के हर शुक्रवार को भक्त भारी संख्या में आते हैं। देवी का विशेष श्रृंगार, रथ सेवा और महाभिषेक किया जाता है।
5. कार्तिक मास दीपोत्सव
इस समय मंदिर परिसर में हजारों दीपों से सजावट की जाती है।कार्तिक स्नान, दीपदान और देवी का विशेष आरती दर्शन होता है। वर्षभर के छोटे छोटे उत्सव होते हैं जैसे की श्रीचक्र पूजा, वर्ष का वार्षिक ब्रह्मोत्सव, विजयदशमी के अगले दिन चामुंडी यात्रा, श्रावण के सोमवार को शिव शक्ति संयुक्त पूजा भी होती है।
चामुंडेश्वरी मंदिर से जुड़े रहस्य और तथ्य (Mystery of Chamundeshwari Temple Mysore)
- यह मंदिर आधिकारिक 51 शक्ति पीठों में नहीं आता, लेकिन इसे अत्यंत शक्तिशाली उप शक्ति पीठ माना जाता है। स्थानीय ग्रंथों में इसे “जन्मांधिका पीठ कहा गया है जहाँ देवी का उग्र रूप प्रतिष्ठित है। भक्तों का विश्वास है कि यहाँ की ऊर्जा सीधी साधना से अनुभव की जा सकती है।
- कथाओं के अनुसार देवी ने महिषासुर का वध इसी पहाड़ी पर किया था। इस घटना के प्रतीक रूप में नीचे एक विशाल महिषासुर की मूर्ति स्थापित है। यह स्थान “महिष विनाश” ऊर्जा का केंद्र माना जाता है।
- पहाड़ी का प्राचीन नाम महाबलाद्रि था, जो शिव के एक रूप से जुड़ा है। महिषासुर के वध के बाद इसका नाम चामुंडी हिल्स पड़ा। यह नाम परिवर्तन देवी की शक्ति विजय का प्रतीक माना जाता है।
- मंदिर के गर्भगृह के नीचे एक अत्यंत शक्तिशाली श्रीचक्र स्थापित है। कहते हैं कि वही इस पीठ की ऊर्जा और सुरक्षा का केंद्र है। यह चक्र तांत्रिक सिद्धियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
- देवी का उग्र रूप अत्यंत शक्तिशाली और निशाचर माना जाता है। इसलिए रात्रि में भक्तों को केवल उनका शांत रूप ही दिखाया जाता है। यह परंपरा सदियों से बिना परिवर्तन के चली आ रही है।
- अमावस्या की रात पहाड़ी पर सीमित साधक तांत्रिक पूजा करते हैं। यह पूजा आम जनता के लिए खुली नहीं होती और प्राचीन परंपरा से चली आ रही है। कहा जाता है कि यहाँ रात में ऊर्जा अत्यधिक सक्रिय होती है।
- कहा जाता है कि प्राचीन काल में यह पहाड़ी एक श्मशान भूमि थी। साधक यहाँ काली साधना और अघोर परंपरा के अनुष्ठान करते थे। बाद में यही स्थान चामुंडी शक्ति का मुख्य धाम बन गया।
- मंदिर तक पहुँचने के लिए 1008 सीढ़ियाँ बनाई गई हैं। संख्या 1008 तांत्रिक और वैदिक परंपराओं में अत्यंत पवित्र मानी जाती है। कहा जाता है कि हर सीढ़ी देवी के 1008 नामों की ऊर्जा का प्रतीक है।
- यह मंदिर वाडियार राजघराना की कुलदेवी का धाम है। दशहरे की शुरुआत से पहले राजा देवी की विशेष पूजा करते थे। माना जाता है कि देवी के आशीर्वाद से ही राज्य की रक्षा होती थी।
- कई साधकों का मानना है कि पहाड़ी की चोटी पर एक प्राकृतिक ऊर्जा वर्तुल है। यहाँ ध्यान करने से मन असाधारण रूप से शांत हो जाता है। कहा जाता है कि पहाड़ी के केंद्र में पृथ्वी की ऊर्जा बहुत मजबूत है।