Kali Ghat Mandir : कालीघाट काली शक्तिपीठ मंदिर के बारे में जानकारी, पूर्ण इतिहास, वास्तुकला, प्रसाद व्यवस्था, आरती का और दर्शन का समय
हनुमान न्यूज़ में आपका स्वागत है। यहां पर आपको इस मंदिर का पूर्ण इतिहास, इसमें किए जाने वाली पूजा, त्योहार, कुछ अनसुनी बातें, मंदिर के आसपास घूमने की अच्छी जगह, रहने और खाने की व्यवस्था, जैसी कई सारी चीजों के बारे में जानकारी मिलेगी। कालीघाट काली शक्तिपीठ मंदिर के बारे में जानकारी हजारों सालों से काला जादू अखंड भारत का हिस्सा रहा है और काला जादू करने के लिए हर गांव हर शहर में कोई ना कोई होता है किंतु जैसे हर देश की एक राजधानी होती है कुछ इसी प्रकार काला जादू करने वाले लोगों की राजधानी कोलकाता को कह सकते हैं। क्योंकि उसे शहर में हजारों की तादाद में तांत्रिक रहते हैं और तांत्रिक विद्या करते हैं। भारतीय हिंदू तांत्रिक परंपरा यह इतनी बड़ी है कि आप जितना उसके बारे में जानने की कोशिश करेंगे वह उतना ही बढ़ता जाएगा और साथ ही खतरनाक भी। तांत्रिक परंपरा में 10 महाविद्याओं का उल्लेख है और उसमें काली पूजा परंपरा में सर्वोच्च स्थान पर आती है। तांत्रिकों की देवी मां काली को माना जाता है और काली माता के मंदिर के अनुसार 51 शक्तिपीठ में से एक शक्तिपीठ है कालीघाट काली शक्तिपीठ जो कोलकाता में स्थित है। देवी भागवत पुराण कालिका पुराण और शक्तिपीठ स्त्रोतों के अनुसार जब माता सती के शरीर को भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र द्वारा विभाजित किया गया था उसे समय माता की दाहिने पैर की उंगलियां यहां पर गिरी थी। यह स्थल पूर्वी भारत के सबसे पुराने और सबसे महत्वपूर्ण पूजा स्थलों में से एक है और साथ ही कर आदि शक्तिपीठों में से एक होने के नाते मंदिर पूरे वर्ष लाखों भक्तों को आकर्षित करता है खासकर काली पूजा नव वर्ष पोइला बैसाख, स्नान यात्रा, दुर्गा पूजा और कई अमावस्या जैसे अवसरों पर। शंकरी देवी शक्तिपीठ मंदिर : Click Here कात्यायनी शक्ति पीठ मंदिर : Click Here विशालाक्षी शक्तिपीठ मंदिर : Click Here शारदा शक्तिपीठ मंदिर : Click Here वैष्णो देवी मंदिर : Click Here ज्वाला देवी मंदिर : Click Here चिंतपूर्णी शक्तिपीठ मंदिर : Click Here जेशोरेश्वरी काली मंदिर : Click Here कालीघाट काली शक्तिपीठ मंदिर का पूर्ण इतिहास (History Of Kali Ghat Mandir) कालीघाट को कालीघाट इसलिए कहा जाता है क्योंकि एक तरफ माता का मंदिर है और दूसरी तरफ गंगा का घाट इसी वजह से इस स्थल को कालीघाट कहा जाता है। यहां पर मां काली की पूजा की शुरुआत पांचवी एवं दसवीं शताब्दी के दौरान हुई थी तब यह स्थल जंगल और गंगा किनारे का था। सबसे आरंभिक रूप में यह मंदिर किसी एक राजा द्वारा नहीं बल्कि आदिवासी या फिर कुछ साधु और तांत्रिकों द्वारा स्थापित माना जाता है। वह लोग मां काली की पूजा अपनी विधियों मैं करते थे। ऐसा मानते हैं कि इस स्थान पर एक छोटा सा देवी स्थान था जहां पर लकड़ी या तो फिर मिट्टी की मूर्ति थी। उसे समय के बेहद बड़े और महान तांत्रिकों के रूप में एक नाम सबसे उभर कर आता है जो है “कृष्णानंद आंगरिया”। माना जाता है की पहली बार इस मंदिर को संरचना के रूप में उन्हीं ने बनाया था इसके ऊपर विद्या विनोद ग में उल्लेख मिलता है कि “कृष्णानंद ने कालीघाट में देवी की मूर्ति स्थापना और पूजा परंपरा को स्थिर किया”लेकिन मंदिर का यह स्वरूप छोटा और तांत्रिक परंपरा वाला था। स्थानिक लोगों के लिए बड़ा मंदिर बनाने की सबसे पहले शुरुआत 17वीं और 18वीं शताब्दी के बीच में हुई। कालीघाट मंदिर को वास्तविक मंदिर के स्वरूप में पहली बार साबरनारॉय चौधरी परिवार द्वारा बनाया गया। यह परिवार बंगाल के प्रसिद्ध जमींदार परिवारों में से एक था जिन्हें नवाबों द्वारा मान्यता प्राप्त हुई थी और भूमि प्रशासन में यह प्रमुख स्थान रखते थे। इन्होंने ही मंदिर के लिए जमींदार में दी थी और स्थानीय पूजा व्यवस्था को स्थापित किया था जिसकी वजह से मंदिर की संरचना मजबूत हुई। आज का मुख्य कालीघाट मंदिर 1809 से 1814 के बीच में पुनः निर्माण करवाया गया था। इस निर्माण में सबसे बड़ी भूमिका थी साबरना परिवार और कुछ कोलकाता के धनी दानवीर व्यापारियों की जिन्हें कालीघाट मंदिर के सेवायत और महंत माना जाता है। इस मंदिर को कली कुंड शक्तिपीठ और पादाङ्गुली पीठ भी कहा जाता है। इस मंदिर को कली कुंड शक्तिपीठ इसीलिए कहा जाता है क्योंकि प्राचीन तांत्रिक ग में यह लिखा है कि कालीघाट का मूल स्थान एक गहरा जल कुंड था जहां पर तांत्रिक साधना पशु जप काली साधना गुप्त अनुष्ठान ज्ञान जैसी कई सारी क्रियाएं की जाती थी। यह आदि गंगा यानी की पुरानी गंगा धारा का जल, गोलाकार कुंड बनता था इस कुंड को देवी का शक्ति प्रवाह माना जाता था। कली कुंड यानी कि एक ऐसा स्थल जहां पर काली मां का दिव्या ऊर्जा केंद्र है। यह नाम लोक परंपरा एवं तंत्र शास्त्र दोनों में मिलता है। कालीघाट को पादाङ्गुली पीठ शक्तिपीठ भी कहा जाता है क्योंकि इस जगह पर माता के पैरों की उंगलियां गिरी थी। पादांगुली शक्तिपीठ यानी कि एक ऐसा स्थल जहां पर सती मां के पैरों की उंगलियां गिरी थी। यहां और एक बेहद महत्वपूर्ण बात है कि प्रत्येक शक्तिपीठ में एक भैरव नियुक्त होते हैं जैसे कि इस जगह पर नकुलेश्वर महादेव देवी का भैरव स्वरूप है। जो देवी की रक्षक शक्ति है, स्थान का दिगपाल है, तांत्रिक ऊर्जा का नियंत्रक है, साधना का स्थिर स्तंभ है, मंडल का पुरुष तत्व है। नकुलेश्वर महादेव का अर्थ है नकुल यानी कि शिव का एक प्राचीन तांत्रिक रूप जिसे कभी-कभी नाग या फिर नेवले का देवी प्रतीक माना जाता है और ईश्वर यानी कि प्रभु। नकुलेश्वर शिव का वह स्वरूप है जो काली की तांत्रिक ऊर्जा को संतुलित रखता है स्थान की रक्षा करता है साधना में अवरोधों को दूर करता है देवी की उग्र शक्ति को सह अस्तित्व देता है यह रूप तंत्र चूद़ामणि और कालीका पुराण में भी उल्लेखित है। काली और भैरव का संबंध आवश्यक है क्योंकि देवी यानी की शक्ति ऊर्जा का स्वरूप है उसी के सामने भैरव शिव स्थिरता और नियंत्रण का स्वरूप है काली की उग्र शक्ति को स्थिरता और दिशा देने का काम भैरव का होता है। इसीलिए कालीघाट में कहा जाता है कि “काली के बिना नकुलेश्वर पूर्ण नहीं, और नकुलेश्वर बिना काली प्रकाश नहीं।” कालीघाट शक्ति … Read more