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Bhadrakali Temple Shakti Peeth: मां भद्रकाली शक्तिपीठ से जुड़ी मान्यताएं, प्रसाद व्यवस्था, आरती, दर्शन का समय और पूजा विधि

हनुमान न्यूज़में आपका स्वागत है। इस ब्लॉग में आपको Bhadrakali Temple Shakti Peeth से जुड़ी हर एक जानकारी मिल जाएगी जैसे की मंदिर का इतिहास मंदिर में चलने वाले कुछ अनोखे अनुष्ठान, मंदिर में क्यों मांसाहारी प्रसाद चढ़ाया जाता है, मंदिर के आसपास घूमने की जगह मंदिर पहुंचने का बेहतरीन समय। मंदिर से जुड़ी हर एक जानकारी के लिए इस ब्लॉग को पूरा पढ़ें। भद्रकाली मंदिर के बारे में जानकारी आध्यात्मिक महत्व से भरपूर और पौराणिक कथाओं से ओतप्रोत कुरुक्षेत्र के हृदयस्थल में, पूजनीय माँ भद्रकाली मंदिर स्थित है, जिसे श्री देवी कूप मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह पवित्र स्थल भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक है और सभी वर्गों के भक्तों के हृदय में एक विशेष स्थान रखता है। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही, मिट्टी, धातु और अन्य सामग्रियों से निर्मित अनगिनत लघु अश्वों को देखकर आगंतुक तुरंत मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। भक्ति और देखभाल के साथ सजाए गए ये प्रसाद एक विस्मयकारी प्रदर्शन का निर्माण करते हैं, जो देवी की कृपा और आशीर्वाद का अनुभव करने वाले असंख्य भक्तों की गहरी आस्था और कृतज्ञता का प्रतीक है। विमला देवी शक्तिपीठ : Click Here गुह्येश्वरी शक्तिपीठ मंदिर : Click Here भद्रकाली मंदिर से जुड़ी कथाएं यह मंदिर माँ भद्रकाली को समर्पित है, जो देवी काली के आठ शक्तिशाली स्वरूपों में से एक हैं। उनकी प्रचंड किन्तु सुरक्षात्मक ऊर्जा शक्ति, साहस और आध्यात्मिक उपचार चाहने वाले साधकों को आकर्षित करती है। हालाँकि, इस मंदिर का महत्व केवल आध्यात्मिक ही नहीं है, बल्कि देवी सती की पौराणिक कथा में भी गहराई से निहित है। प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, भगवान शिव की पतिव्रता पत्नी सती ने अपने पिता, राजा दक्ष द्वारा उनका और भगवान शिव दोनों का अपमान किए जाने पर अपना जीवन समाप्त करने का निर्णय लिया। अत्यंत वेदना और भक्ति के भाव से, उन्होंने अपने पिता द्वारा आयोजित एक यज्ञ की अग्नि में आत्मदाह कर लिया। दुःख और पीड़ा से अभिभूत, भगवान शिव उनके निर्जीव शरीर को लेकर ब्रह्मांड में भटकते रहे, जब तक कि भगवान विष्णु ने ब्रह्मांडीय संतुलन स्थापित करने के लिए हस्तक्षेप नहीं किया। अपने सुदर्शन चक्र से, उन्होंने उनके शरीर को 51 टुकड़ों में विभाजित कर दिया, जो धरती पर अलग-अलग स्थानों पर गिरे और प्रत्येक एक पवित्र शक्तिपीठ बन गया।भद्रकाली मंदिर स्थल पर, ऐसा माना जाता है कि सती का दाहिना टखना एक कुएँ में गिरा था, जिससे यह स्थान असाधारण रूप से पवित्र हो गया। आज भी, मंदिर के मध्य में एक भव्य श्वेत संगमरमर का कमल स्थापित करके इस दिव्य संबंध का सम्मान किया जाता है। भक्तों का मानना है कि यह कमल सती के टखने की पवित्र छाप धारण करता है और शक्तिपीठ की आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि इस स्थान पर पूजा करने से शांति, शक्ति और मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। कई भक्त शनिवार को यहाँ आते हैं, जिसे देवी का आशीर्वाद पाने के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। भद्रकाली मंदिर और महाभारत का संबंध इस मंदिर का आध्यात्मिक महत्व महाभारत से इसके जुड़ाव के कारण और भी बढ़ जाता है। कुरुक्षेत्र में लड़े गए महान युद्ध के दौरान, न्याय की खोज में निकलने से पहले, पांडव माँ भद्रकाली का आशीर्वाद लेने इस मंदिर में आए थे। उन्होंने कौरवों के विरुद्ध अपने कठिन युद्ध में विजय, साहस और सुरक्षा की प्रार्थना की थी। युद्ध में विजयी होने के बाद, वे देवी को मिट्टी और धातु के घोड़े अर्पित करके अपना आभार व्यक्त करने के लिए मंदिर लौटे। समय के साथ, भक्ति का यह कार्य एक प्रिय परंपरा बन गया, और आज भी, जिन भक्तों की प्रार्थनाएँ सुनी जाती हैं या जिनकी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं, वे आस्था और कृतज्ञता के प्रतीक के रूप में छोटे घोड़े चढ़ाते हैं। भद्रकाली मंदिर से जुड़ी मान्यताएं (Beliefs Associated With Bhadrakali Temple) यह मंदिर एक अन्य प्रिय परंपरा – मुंडन संस्कार – से भी निकटता से जुड़ा हुआ है। स्थानीय मान्यता है कि इसी मंदिर में भगवान कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम ने अपने मुंडन संस्कार करवाए थे। आज भी, परिवार अपने बच्चों को यह अनुष्ठान संपन्न कराने के लिए यहाँ लाते हैं, यह विश्वास करते हुए कि ऐसा करने से उनके प्रियजनों को ईश्वरीय आशीर्वाद, सुरक्षा और समृद्धि प्राप्त होती है। वर्ष भर, यह मंदिर आध्यात्मिक उत्सवों का एक जीवंत केंद्र बना रहता है। नवरात्रि, रक्षाबंधन और दुर्गा पूजा जैसे त्यौहार यहाँ भव्य सजावट, अनुष्ठानों और सामुदायिक समारोहों के साथ मनाए जाते हैं। इस दौरान, मंदिर परिसर रोशनी, फूलों और मंत्रोच्चार से जगमगा उठता है, जिससे देश भर से श्रद्धालु अपनी प्रार्थनाएँ करने और इस पवित्र उत्सव में भाग लेने आते हैं। कुरुक्षेत्र स्थित भद्रकाली शक्ति पीठ में प्रसाद व्यवस्था मंदिर में आयोजित पूजा और अनुष्ठानों में एक गहन आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक भूमिका निभाती है। प्रसाद, या भोग, भक्ति और पवित्रता से बनाया गया भोजन है, और इसे कृतज्ञता व्यक्त करने और देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने का एक पवित्र तरीका माना जाता है। इस मंदिर में, प्रसाद चढ़ाने की प्रक्रिया न केवल एक अनुष्ठानिक प्रथा है, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आध्यात्मिक परंपराओं के प्रति आस्था, अनुशासन और पालन की अभिव्यक्ति भी है। भद्रकाली मंदिर में चढ़ाए जाने वाले प्रसाद विविध होते हैं और भक्तों की भक्ति को दर्शाते हैं। भक्त केले, नारियल, आम और अन्य मौसमी फल लाते हैं, जिन्हें शुद्ध और पौष्टिक माना जाता है, जो प्रकृति की सर्वोत्तम देन का प्रतीक हैं। सुंदरता, पवित्रता और भक्ति के प्रतीक फूल भी प्रचुर मात्रा में चढ़ाए जाते हैं, जिनमें चमेली, गुलाब और गुड़हल जैसी किस्में सबसे लोकप्रिय हैं। इन फूलों को सावधानीपूर्वक चुना जाता है और श्रद्धा व्यक्त करने के एक तरीके के रूप में देवी को अर्पित किया जाता है। मिठाइयाँ प्रसाद का एक अनिवार्य हिस्सा होती हैं, जिनमें लड्डू, गुड़ से बनी चीज़ें और पायसम जैसी चीज़ें सबसे आम हैं। इन मीठे प्रसादों को शुभ माना जाता है और माना जाता है कि ये देवी को प्रसन्न करते हैं, स्वास्थ्य, समृद्धि और आध्यात्मिक कल्याण के लिए उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। हाल के वर्षों में, कुरुक्षेत्र के भद्रकाली मंदिर में मंदिर प्रशासन ने चढ़ाए जाने वाले प्रसाद की शुद्धता सुनिश्चित करने पर … Read more

Vimla Devi Shaktipeeth: विमला देवी शक्तिपीठ मंदिर से जुड़े रहस्य, इतिहास, प्रसाद व्यवस्था, आरती, दर्शन का समय और मंदिर के नीति नियम

हनुमान न्यूज़ में आपका स्वागत है। यहां पर आपको विमला देवी मंदिर से जुड़ी हर जानकारी मिलेगी जैसे की मंदिर का इतिहास मंदिर से जुड़ी तांत्रिक कथाएं, जाने का बेहतरीन समय, प्रसाद एवं दर्शन व्यवस्था, कई सारे रोचक तथ्य वगैरा। विमला देवी शक्तिपीठ के बारे में जानकारी विमला मंदिर को एक शक्ति पीठ माना जाता है। कुछ मान्यताओं के अनुसार यहाँ सती माता की नाभि या हड्डी का कोई अंग गिरा था इसलिए इस स्थान का महत्व वैष्णव और शैव‌ शाक्त, दोनों परंपराओं में है। देवी बिमला को जगन्नाथ जी की शक्ति माना जाता है। पुराणों के अनुसार, जब तक भगवान जगन्नाथ को देवी विमला को प्रसाद नहीं चढ़ाया जाता, तब तक जगन्नाथ का भोग पूर्ण नहीं माना जाता। उड़ीसा परंपरा में देवी बिमला को भैरवी शक्ति और मातृका देवी के रूप में पूजा जाता है। कंकालितला मंदिर : Click Here वैष्णो देवी मंदिर : Click Here विमला देवी शक्तिपीठ का पूर्ण इतिहास मंदिर का सबसे प्राचीन स्रोत 7वीं से 9वीं सदी से पहले का है। स्कंद पुराण के उड्राखण्ड में बिमला मंदिर का उल्लेख है, जो जगन्नाथ मंदिर से भी पुराना माना जाता है। इससे संकेत मिलता है कि इसका मूल शक्ति पीठ स्वरूप संभवतः 8वीं ओर 9वीं सदी या उससे भी पहले का है। उस समय यह क्षेत्र तांत्रिक शक्ति उपासना का प्रमुख स्थान था। सबसे पहले किस शासक ने बनवाया, इस पर पक्की शिलालेखीय जानकारी नहीं है, परंतु मूल मंदिर प्राचीन, पुराणकालीन और लोकतंत्र परंपरा से उभरा है। 11वीं से 12वीं सदी के दौरान पुरी में आज दिखने वाला पत्थर का विमला मंदिर गंग वंश ने बनवाया। साल 1078 से 1147 के दौरान अनन्तवर्मन चोडगंग देव मैं कई सारे मंदिर बनवाए थे साथ ही में बड़े पैमाने पर कलिंग शैली के मंदिर बनवाए थे। माना जाता है कि जगन्नाथ मंदिर का भी मुख्य निर्माण इन्हीं ने करवाया था। उसी काल में बिमला मंदिर का प्राचीन रूप व्यवस्थित रूप से पत्थर का बनाया गया। उस काल में पुरानी शक्ति स्थापना को ग्रेनाइट और बलुआ पत्थर से पुनर्निर्मित किया गया, मंदिर को श्रीमंदिर परिसर के मुख्य शक्तिपीठ के रूप में स्थापित किया गया और साथ ही बिमला देवी को “जगन्नाथ की शक्ति” घोषित किया गया। मत्स्य और सोमवंशी का प्रभाव 10वीं 11वीं सदी के अवशेष मैं मिलता है। इस काल के कुछ शिल्प मातृका मूर्तियाँ, यक्षिणी आकृतियाँ जैसी चीजें बताते हैं कि गंग वंश से पहले भी यहाँ छोटा शक्ति स्थान था, जिस पर लगातार लोक पूजन होता रहा। 15वीं–16वीं सदी को गजपति काल के नाम से जाना जाता है और साथ ही यह तांत्रिक प्रतिष्ठा का विस्तार रहा था। गजपति राजाओं ने पुरी की शक्ति पूजा को काफी प्रोत्साहन दिया। इस समय  बिमला देवी को जगन्नाथ के महाप्रसाद की अधिकारिणी घोषित किया गया था। नवरात्रि और पंचमी तांत्रिक अनुष्ठानों को दरबारी संरक्षण मिला और मंदिर के आसपास कई छोटे देवालय जोड़े गए। 1751 से 1803 के दौरान मराठा शासन मैं मंदिर का पुनः संरक्षण हुआ।  मराठाओं ने पुरी की धार्मिक व्यवस्थाओं को मजबूत किया था। बिमला मंदिर की नियमित पूजा, नियमावली और महाप्रसाद प्रणाली को व्यवस्थित किया और कुछ छोटे उप मंदिर और मंडप इसी समय मजबूत किए गए। ब्रिटिश शासन यानी कि सन 1803 से 1947 के दौरान वह मंदिर का संरक्षण करते थे परंतु नियंत्रण के साथ। अंग्रेजों ने मंदिर पर सीधे नियंत्रण नहीं किया, लेकिन मंदिर रिकॉर्ड, संपत्ति विवरण, पुजारी व्यवस्था को दर्ज करवाया। 19वीं सदी के ASI विवरणों में विमला मंदिर को “पुरी शक्ति स्थल बहुत प्राचीन” बताया गया। सन 1960 से 1970 के दौरान पुरातत्व सर्वेक्षण ने मंदिर के पत्थर, दीवार और गर्भगृह की मरम्मत की। सन 1980‌ से 2000 के दौरान मंदिर के भीतर मूल मूर्ति की पुनःस्थापना करवाई गई, दीवारों की सफाई, अलंकरण और सुरक्षा व्यवस्था स्थापित की गई। सन 2000 से 2020 के दौरान श्री मंदिर एक्ट के अंतर्गत विमला मंदिर आज शक्तिपीठ साथ ही श्रीमंदिर का मुख्य अंग दोनों के रूप में संरक्षित है।नवरात्रि के अनुष्ठान पूरी तरह नियमित किए गए। CCTV, सुरक्षा, प्रवेश नियंत्रण आदि बढ़े। विमला देवी शक्तिपीठ मंदिर से जुड़े रहस्य और मान्यताएं यह सबसे अनोखा शक्तिपीठ है। पुरी में जगन्नाथ मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध है, लेकिन कम लोग जानते हैं कि जगन्नाथ का नाभिदेश बिमला देवी हैं। हर भोग और प्रसाद पहले देवी बिमला को अर्पित किया जाता है, तभी भगवान जगन्नाथ उसे स्वीकार करते हैं। इसे तांत्रिक परंपरा में ‘शक्ति प्रधान’ व्यवस्था कहा जाता है। सती के पाद ओर तल का पतन परंतु तांत्रिक शक्ति का केंद्र भी है। पुरी का विमला शक्तिपीठ सती के पाद ओर तल के पतन स्थल के रूप में माना जाता है। कथाओं में बताया गया है कि यहाँ “भूमिगर्भ” में सती का पादथि रहता है,  इसलिए इसे ‘धरती के भीतर छिपा शक्तिपीठ’ भी कहा जाता है। विमला देवी का रूप बाहर से सरल और भीतर से उग्र हैं। मूर्ति बाहर से शांत दिखती है, परन्तु तांत्रिक मत में इन्हें उग्र तारा, काली, या कामाख्या की सहोदर शक्ति भी कहा जाता है। कुछ गूढ़ ग्रन्थ बताते हैं कि देवी के गर्भगृह में रात के समय ऊर्जा इतनी तीव्र होती है कि साधना केवल सिद्धों को ही अनुमति है। पुरातन तांत्रिकों का प्रवेश और ‘गरुड़द्वार’ का गूढ़ महत्व। बिमला जी का गर्भगृह जगन्नाथ मंदिर के दक्षिण पश्चिम कोने में है। पुराने तांत्रिकों का मानना था कि मंदिर का यही कोना ‘रहस्यमय क्षेत्र’ है, यहाँ रात्रि कालीन तंत्र साधना की जाती थी, और यह मार्ग गरुड़द्वार से जुड़ा है, जिसे तांत्रिक प्रवेश द्वार कहा जाता था। ‘रक्त’ और ‘मत्स्य” भोग की चिर पुरातन परंपरा है। अधिकांश शक्तिपीठों में उग्र रूप से बलि या मत्स्य आदि की प्राचीन परंपरा रही है। पुरी की स्थानीय किंवदंती में कहा जाता है कि पुराने समय में नवरात्रि में शक्ति तत्त्व के रूप में मत्स्य या विशेष भोग चढ़ता था। अब यह परंपरा केवल प्रतीकात्मक रूप में की जाती है। रात के समय गर्भगृह में प्रवेश का रहस्य कुछ इस प्रकार है।लोककथाओं में माना जाता है कि रात के कुछ विशेष मुहूर्तों में देवी का उग्र रूप सक्रिय रहता है, इसलिए प्राचीन काल में सामान्य लोगों को रात में गर्भगृह में जाने की अनुमति नहीं थी। यह पद्धति कई तंत्रपीठों में अब भी देखी जाती है। जगन्नाथ … Read more

Kankalitala Temple: कंकालितला मंदिर का परिचय, इतिहास, वास्तुकला, प्रसाद व्यवस्था, त्यौहार, नियम समय और पूजा विधि

हनुमान न्यूज़ में आपका स्वागत है। यहां पर आपको कंकालितला शक्तिपीठ से जुड़ी हर जानकारी मिलेगी। जैसे की मंदिर का इतिहास, जाने का बेहतरीन समय, पूजा, दर्शन, प्रसाद व्यवस्था, कुछ अनसुनी बातें और भी बहुत कुछ। कंकालितला मंदिर का परिचय कंकालितला मंदिर पश्चिम बंगाल के बिरभूम जिले के शांतिनिकेतन के पास स्थित एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। यह स्थान देवी सति के शरीर के कंकाल गिरने की मान्यता से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसे कंकालितला कहा जाता है। यह शक्तिपीठ अपनी तांत्रिक परंपरा, शांत प्राकृतिक वातावरण और नदी किनारे स्थित होने के कारण अत्यंत पवित्र माना जाता है। मंदिर कोपाई नदी के तट पर बना है, जहाँ बड़ी संख्या में भक्त देवी काली/सती कंकालेश्वरी के दर्शन करने आते हैं। यहाँ मुख्य गर्भगृह में देवी का कंकालीत रूप पूजित होता है, जो शक्ति और तांत्रिक साधना का प्रतीक है। कंकालितला, शांतिनिकेतन से लगभग 8-9 किलोमीटर की दूरी पर है और विश्व भारती विश्वविद्यालय आने वाले लोग भी इसे अवश्य देखने जाते हैं। ज्वाला देवी मंदिर : Click Here जेशोरेश्वरी काली मंदिर : Click Here कालीघाट शक्ति पीठ : Click Here चामुंडेश्वरी मंदिर : Click Here कंकालितला मंदिर का इतिहास (History of Kankalitala Temple) जब राजा दक्ष ने अपने यज्ञ में भगवान शिव का अपमान किया, तो सती ने क्रोध और अपमान से व्याकुल होकर यज्ञकुंड में देह त्याग कर दिया। दुखी शिव जब सती का शरीर लेकर तांडव करते हुए ब्रह्मांड में घूम रहे थे, तब विष्णु ने जगत हित के लिए सती के शरीर के अंगों को विभिन्न स्थानों पर गिराया। इन्हीं स्थानों को शक्तिपीठ कहा जाता है। मान्यता है कि सती का कंकाल यहाँ गिरा था, जिससे इस स्थान का नाम कंकालितला पड़ा। यहाँ देवी को “कंकालेश्वरी” या “कंकाल काली” के रूप में पूजा जाता है। यह मंदिर प्राचीन काल से ही तांत्रिक साधु का मुख्य स्थल माना जाता है। बंगाल के कालीकुंड क्षेत्र में यह एक अत्यंत शक्तिशाली केंद्र माना जाता था। गृहतंत्र, कोलाचार और विराचार परंपरा के साधक यहां रात में साधना करते थे। कई तांत्रिक ग्रन्थो में कंकालितला को ‘कंकाल भूमि’, ‘शक्ति कांडा स्थल’ और ‘काली तट शक्ति केंद्र’ क्षेत्र भी कहा गया है। यह कोपाई नदी के किनारे पर बसा प्राचीन तीर्थ है मंदिर के स्थान पर पहले एक खुला मठ था। यहां कोई बड़ा निर्माण नहीं था। बस एक पवित्र स्थान था जहां साधक धुनी लगाकर साधना करते थे। कोपाई नदी के किनारे स्थित होने के कारण इसे पावन एवं ऊर्जावान शक्ति क्षेत्र माना जाता था। यहां पर 17सी से 18वीं शताब्दी के दौरान पहला पक्का मंदिर बनवाया गया। बोलपुर ओर बिरभूमि के जमींदारों ने मिलकर यहां कंकालेश्वरी देवी का पहला गर्भगृह बनवाया, साथ ही में साधकों के लिए छोटा मठ और कोपाई नदी के पास पूजा स्थान भी बनवाया गया। यही कंकलितला का सबसे पहला आधिकारिक मंदिर माना जाता है। 19वीं सदी में इसका पुनः निर्माण और विस्तार किया गया। इस समय में पुराने मंदिर की मरम्मत गर्भगृह को ईंट पत्थर से मजबूत बनाना  साधकों के लिए रहने की कुटिया बनाना और तांत्रिक कुंड का विस्तार करना जैसी कई सारी चीजे हुईं। यह सब कार्यस्थानिक परिवारों और जमींदारों में करवाया। 20वीं सदी में शांतिनिकेतन के कारण प्रसिद्ध मिली। रविंद्रनाथ टैगोर और शांतिनिकेतन के कारण यह स्थान सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण बन गया। इस दौरान मंदिर की मुख्य इमारत दोबारा बनी, सभा मंडप जोड़ा गया, नया प्रवेश द्वार और प्रांगण तैयार हुआ, कोपाई नदी के किनारे घाट बने, स्थानीय समितियां और बंगाल के दानदाताओं ने मंदिर को नया रूप दिया। अब कंकालितला मंदिर में आधुनिक गर्भगृह, विस्तृत प्रांगण, तांत्रिक कुंड, सभा भवन, तीर्थ यात्रियों के लिए सुविधाएँ, नए सुरक्षा और यज्ञ स्थल बन चुके हैं। यह अब शांतिनिकेतन का प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थल है। कंकालितला मंदिर की वास्तुकला कंकालितला मंदिर की वास्तुकला बंगाल की पारंपरिक झोपड़ी शैली में बनी है। यह मंदिर में आपको बंगाल के ग्रामीण घरों जैसी छत दिखाई देती है, जिसे एक चला दो चला शैली कहते हैं। हल्कै ढलान वाली छत ऊपर से अर्ध गोले और साधारण निर्माण, दीवारों में छोटी और न बहुत ज्यादा अलंकरण। यह शैली बंगाल के कई प्राचीन शक्ति पीठों में मिलती है। मंदिर का मुख्य गर्भगृह छोटा शांत और गहरा है। इसमें मां की प्रतिमा नहीं बल्कि श्री श्री कंकाला की माता की पवित्र पिंडी स्थापित है। गभग्रह का फर्श काले स्लेट पत्थर से बना हुआ है जो प्राचीनता दर्शाता है। कंकालीतला की विशेषता यह है कि मंदिर के पीछे बाटी कोपी नदी धार्मिक परिप्रेक्ष्य में शामिल है। आमतौर पर परिक्रमा मार्ग खुली जमीन पर होते हैं। नदी की और खुले स्थान पैर होते हैं जहां तांत्रिक अनुष्ठानों के लिए एक कोना जो बहुत साधारण लेकिन ऐतिहासिक है। मंदिर का अग्रभाग एक खुले आंगन या मंडप जैसे क्षेत्र से बना है जहां कीर्तन, पूजा, होम आदि क्रियाएं होती हैं। ऊपर लोहे की छत या टीन शेड जैसा कवर है जो बारिश से बचने के लिए बाद में जोड़ा गया था। मंदिर के द्वारा शिल्प और बाहरी सजावट भी देखने लायक है क्योंकि यहां पर भव्य नक्काशी नहीं है फिर भी लाल पीली बंगाली रंगाई, प्रवेश द्वार पर साधारण बंगाली लोक ज्योतिषी चिन्ह और कहीं-कहीं तांत्रिक त्रिपुंड त्रिशूल और महाकाल चिन्ह बने हैं। यह सब इसे एक तांत्रिक प्रधान शक्तिपीठ की भावना देते हैं।  यहां तांत्रिक अनुष्ठान क्षेत्र भी है कंकालितला एक प्रमुख तांत्रिक साधना स्थान होने के कारण इसके परिसर में एक छोटा श्मशान तट जैसा क्षेत्र है, काली उपासना के लिए यहां पर अलग स्थान है और साथ ही में रात के समय तांत्रिक साधना के लिए निर्मित छोटे मंच भी हैं। यह सामान्य मंदिरों में नहीं मिलते इसलिए यह बहुत विशिष्ट विशेषता है। यह स्थान नदी के पास है इसी वजह से मंदिर का आधार भूमि बालू, लाल मिट्टी और ईंट पत्थर मिश्रित से बना है। यहां पर बारिश में बदली जाने वाली भूमि स्थित है इसी कारण मंदिर की वास्तुकला हल्की और अत्यधिक भारी नहीं बनाई गई है। समय के साथ यह मंदिर का पुनः निर्माण भी हुआ है। प्रारंभ में मंदिर बेहद साधारण था परंतु वर्तमान में नई ईंटों और प्लास्टर से नवीनीकरण किया गया है। कुछ हिस्सों में ग्रिल और सीमेंट का उपयोग भी किया गया है लेकिन मूल ग्रामीण शैली को काफी … Read more

Chamundeshwari: चामुंडेश्वरी मंदिर के बारे में जानकारी, मंदिर का इतिहास, वास्तुकला, प्रसाद व्यवस्था, आरती और दर्शन का समय

हनुमान न्यूज़ में आपका स्वागत है। यहां पर आपको चामुंडेश्वरी मंदिर से जुड़ी हर जानकारी मिलेगी जैसे की मंदिर का इतिहास, उसकी वास्तुकला, उसकी परंपराएं, उसकी पूजा विधि, आरती और दर्शन का समय, आसपास घूमने की अच्छी जगह और भी बहुत कुछ। चामुंडेश्वरी मंदिर के बारे में जानकारी कर्नाटक के मैसूर शहर की चामुंडी पहाड़ी पर स्थित चामुंडेश्वरी मंदिर दक्षिण भारत का अत्यंत प्राचीन और प्रसिद्ध शक्ति पीठ माना जाता है। यह मंदिर देवी चामुंडेश्वरी (जिसे देवी दुर्गा का उग्र रूप कहते हैं) को समर्पित है, जिन्हें महिषासुर मर्दिनी भी कहा जाता है क्योंकि देवी ने यहीं पर असुर महिषासुर का वध किया था। यह स्थान अष्टदश शक्ति पीठों में से एक के रूप में आदरपूर्वक माना जाता है, जहाँ मान्यता है कि माता सती का केश भाग यहाँ पृथ्वी पर गिरा था। हजारों वर्षों से यह स्थान तांत्रिक शाक्त परंपराओं, प्राचीन अनुष्ठानों, और मैसूर साम्राज्य की राजपरंपरा का मुख्य केंद्र रहा है। वैष्णो देवी मंदिर : Click Here नैना देवी मंदिर : Click Here गुह्येश्वरी शक्तिपीठ मंदिर : Click Here कामाख्या देवी मंदिर : Click Here चामुंडेश्वरी मंदिर का इतिहास (History of Chamundeshwari Temple) 6 वीं से 10 वीं शताब्दी के दौरान यह स्थान चामुंडी देवी यानी की काली दुर्गा का उग्र रूप का एक साधना केंद्र रहा है। सबसे पुराने शिलालेख और ताम्र पत्र बताते हैं की 6-10 वीं शताब्दी में यहां एक छोटी गुफा और लकड़ी का छोटा मंदिर था। माना जाता है कि इसे गंगैय राजवंश के शासको ने एक साधारण देवी स्थल के रूप में स्थापित किया था। उस समय देवी को चामुंडा के नाम से पूजा जाता था। 10वीं से 12वीं शताब्दी में होयसला काल के दौरान मंदिर का पहला पुनः निर्माण किया गया। होयसला राजाओं ने मंदिर को पहले स्थाई आकार दिया। पत्थर का गर्भगृह, स्तंभ और देवी की उग्र प्रतिमा इसी काल की मानी जाती है। यह समय चामुंडी पर्वत को शौक तांत्रिक साधना स्थल के रूप में प्रसिद्ध करने वाला दौर था। 14वीं-16वीं शताब्दी के दौरान विजयनगर साम्राज्य ने मंदिर का विस्तार किया। विजयनगर सम्राटों ने दक्षिण भारत में शक्ति परंपरा को बल दिया। इसी कल के दौरान चामुंडी पर्वत पर नक्काशीदार मंडप, बड़े पुजारी आवास और पूजा-व्यवस्था बनाई गई। देवी को “चामुंडेश्वरी” नाम इसी समय से राज्य देवी के रूप में प्राप्त हुआ। 17वीं शताब्दी को मंदिर का स्वर्ण काल माना जाता है क्योंकि उस समय वाडियार राजवंश वहां पर राज करते थे। यह मंदिर आज जिस रूप में प्रसिद्ध है, वह मुख्यतः मैसूर के वाडियार राजाओं की देन है। वर्ष 1659 के दौरान मैसूर के राजा राज वाडियार ने मंदिर को एक विशाल द्रविड़ीय शैली का रूप दिया। पहले का छोटा होयसला मंदिर पुनर्निर्मित कर भव्य पत्थर का गर्भगृह और प्रमुख सभा मंडप का निर्माण कराया। देवी चामुंडेश्वरी को मैसूर साम्राज्य की कुलदेवी घोषित किया गया क्योंकि राज वाडियार ने विजयनगर से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद देवी को अपना ईश्वरीय प्रतिनिधि और राज्य की रक्षक देवी माना था। 1650 से 1750 के दौरान चामुंडी हिल पर “महिषासुर मूर्ति” मूर्ति बनाई गई। कहा जाता है कि यहाँ असुर महिषासुर का वध माता चामुंडा ने कियाथा इसी कारण मैसूर का नाम पड़ा महिषापुरा या फिर मैसूर। बाद के वाडियार शासकों ने हल्दी नारंगी रंग की विशाल महिषासुर की मूर्ति स्थापित की, जो आज इसकी पहचान है। वर्ष 1799 1868 के दौरान महाराजा कृष्णराज वाडियार III ने 1000 सीढ़ियों का निर्माण करवाया। 1827 में 1008 सीढ़ियों का बड़ा निर्माण कराया गया था। पर्वत चढ़ने का यह मार्ग आज भी सबसे प्रसिद्ध मार्ग है। इसी काल में मंदिर के त्योहारों, विशेषकर दशहरा पर्व को सरकारी संरक्षण मिला। साल 1930 से 1970 महाराजा जयचामराज वाडियार ने आधुनिक विस्तार किया। मुख्य गोपुरम का विस्तार, सोने की परत चढ़ी सजावट, और तलहटी पर विशेष मंडप बनाए गए थे। देवी के रथ, जुलूस और दशहरा उत्सव को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई थी।  स्वतंत्रता के बाद मंदिर व कर्नाटक सरकार द्वारा संयुक्त रूप से देखरेख की व्यवस्था बनी। पहाड़ी सड़क, यात्री ढांचे, पार्किंग, रेस्टरूम, और इलेक्ट्रिक वाहनों के मार्ग बनाए गए। 2008 से 2020 के बीच मंदिर परिसर का आधुनिकीकरण और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया गया। आज इस शक्ति पीठ को हर वर्ष 50 लाख से अधिक भक्त दर्शन करते हैं। चामुंडेश्वरी मंदिर की वास्तुकला चामुंडेश्वरी मंदिर का निर्माण द्रविड़ीय शैली में हुआ है, जिसमें ऊँचे गोपुरम, गहरे गर्भगृह, विस्तृत मंडप और नक्काशीदार स्तंभ मुख्य विशेषताएँ हैं। मंदिर की वास्तुकला 6वीं से 20वीं शताब्दी तक कई चरणों में विकसित हुई है। मुख्य गोपुरम जो द्रविड़ीय शैली की पहचान है मंदिर का मुख्य प्रवेशद्वार एक 7 स्तरीय ऊँचा गोपुरम है। इस गोपुरम पर देवी देवताओं, यौद्धाओं, लोक चरित्रों और शाक्त प्रतीकों की जटिल नक्काशी की गई है। हर मंज़िल धीरे धीरे संकरा होती जाती है। यह द्रविड़ीय शैली की प्रमुख विशेषता है। सबसे ऊपर “कलश” लगाया गया है, जो सोने जैसी चमक लिए है। गोपुरम का रंग हल्का पीला है, मैसूर परंपरा का प्रतीक है। द्वारपाल और शाक्त प्रतीक मुख्य द्वार के दोनों ओर विशाल द्वारपाल की प्रतिमाएँ हैं। ये देवी के उग्र रूप की रक्षा संस्कृति को दर्शाती हैं। ऊपर के हिस्सों में महिषासुर मर्दिनी की कई आकृतियाँ हैं, जो संदेश देती हैं कि यह देवी उग्र शक्ति का स्थान है। विशाल स्तंभ मंडप यह गोपुरम के बाद एक बड़ा सभामंडप है जिसमें‌ 30+ नक्काशीदार ग्रेनाइट स्तंभ है, होयसला और वाडियार शैली का सम्मिश्रण है। स्तंभों पर शेर, नाग, कमल, और देवी के विभिन्न रूपों की आकृतियाँ बनाई गई है। यहीं बड़े पर्वों और अनुष्ठानों का आयोजन होता है। मंडप का फर्श पुरानी काली चट्टानों से बना है जो कई जगहों पर चमकदार हो चुका है। कोर मंडप: गर्भगृह प्रवेश मंडप गर्भगृह से पहले एक छोटा अंतराल मंडप है। यहाँ से देवी की ऊर्जा अधिक तीव्र महसूस होती है। होयसला की पुरानी मूर्तिकला यहाँ साफ दिखाई देती है। गर्भगृह जिसे मंदिर का हृदय कहा जाता है यह वास्तुकला का सबसे महत्वपूर्ण और प्राचीन भाग है। गर्भगृह की विशेषताएँ कुछ इस प्रकार है कि बहुत गहरा और छोटा, ऐसा कि प्रकाश कम प्रवेश करता है। पूरी दीवारें मोटे ग्रेनाइट से बनी है। 6वीं 10वीं सदी की शैली में बना है। यहाँ स्थित देवी की अष्टभुजा चामुंडेश्वरी की प्रतिमा है। … Read more

Guhyeshwari Temple : गुह्येश्वरी शक्तिपीठ मंदिर का इतिहास, वास्तुकला, प्रसाद व्यवस्था, आरती और दर्शन का समय

हनुमान न्यूज़ में आपका स्वागत है। यहां पर आपको इस मंदिर का पूर्ण इतिहास, इसमें किए जाने वाली पूजा, त्योहार, कुछ अनसुनी बातें, मंदिर के आसपास घूमने की अच्छी जगह, रहने और खाने की व्यवस्था, जैसी कई सारी चीजों के बारे में जानकारी मिलेगी। गुह्येश्वरी शक्तिपीठ मंदिर के बारे में जानकारी मंदिरों का शहर, या यूं कहे की ऐतिहासिक भारतीय धरोहर से भरपूर और बुद्ध संस्कृति से सज्ज शहर काठमांडू। भारतीय संस्कृति या यूं कहें कि सनातन संस्कृति के धरोहर स्वरूप है मंदिर। भारत भर में हजारों की संख्या में आपको मंदिर मिल जाएंगे किंतु कई सारे मंदिर ऐसे भी हैं जो विदेश में भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। भारत भर में मंदिरों की श्रृंखलाएं हैं जैसे की चार धाम, 12 ज्योतिर्लिंग, 51 शक्ति पीठ, छोटा चार धाम, सप्तपुरी, पंचभूत स्थलम, दिव्य देशम, पंच केदार और अरुपदैवेदु। भारत भर में तांत्रिक विद्या करवाई जाती हैं और एक दो नहीं किंतु हजारों सालों से यह विद्या का सदुपयोग और दुरुपयोग होता है। अगर हम भारत की बात करें तो कामाख्या मंदिर असम तांत्रिक विद्या करने वाले लोगों के लिए एक प्रमुख मंदिर माना जाता है और भारत के बाहर काठमांडू शहर में 51 शक्तिपीठों में से एक गुह्येश्वरी मंदिर मंदिर अपने तांत्रिक उपासकों के लिए महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल माना जाता है। माना जाता है कि सती माता के घुटने या कूल्हे यहां पर गिरे थे। स्थान का नाम “गृहदेश्वरी” है जिसका अर्थ है “गुप्त स्थान की देवी”। यह मंदिर पशुपति क्षेत्र से लगभग 1 किलोमीटर पूर्व में बागमती नदी के दक्षिणी तट पर स्थित है। धर्मनिष्ठ हिंदुओं के लिए, शिव और शक्ति अविभाज्य हैं। दो ब्रह्मांडीय ऊर्जाएँ जो मिलकर ब्रह्मांड का निर्माण, संरक्षण और विनाश करती हैं। यह गहरी जड़ें वाली अवधारणा गुह्येश्वरी मंदिर और पशुपतिनाथ मंदिर की निकटता में खूबसूरती से परिलक्षित होती है। जहाँ पशुपतिनाथ भगवान शिव की पुरुष ऊर्जा के एक शक्तिशाली प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित हैं, वहीं गुह्येश्वरी देवी की पोषणकारी, रचनात्मक शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। कई तीर्थयात्रियों का दृढ़ विश्वास है कि गुह्येश्वरी को श्रद्धांजलि दिए बिना पशुपतिनाथ की तीर्थयात्रा अधूरी है। ऐसा कहा जाता है कि केवल दोनों पहलुओं शिव और शक्ति का सम्मान करके ही कोई सच्ची आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त कर सकता है। परिणामस्वरूप, धार्मिक कारणों से काठमांडू आने वाले अधिकांश भारतीय तीर्थयात्री इस आध्यात्मिक क्रम का पालन करते हैं  पहले पशुपतिनाथ में पूजा करते हैं और फिर दिव्य चक्र को पूरा करने के लिए गुह्येश्वरी जाते हैं। वैष्णो देवी मंदिर : Click Here नैना देवी मंदिर : Click Here गुह्येश्वरी शक्तिपीठ मंदिर का इतिहास (History of Guhyeshwari) कई लोग ऐसा मानते हैं की वर्तमान मंदिर संभवत राजा शंकर देव के शासनकाल में लगभग 1000 ई सन में निर्मित हुआ था और उसके बाद इस मंदिर को राजा प्रताप मल्ल ने 17वीं शताब्दी में इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। यह मंदिर प्रवेश द्वार पर भी दृष्टि से ओझल रहता है जो एक कड़ी सीढ़ी की और जाता है। यह तिब्बती बौद्ध और हिंदू प्रतिमाओं से भरपूर कलाकृतियों से सुसज्जित है। नेपाल के राजतंत्र के पतन तक यह देश एक हिंदू राष्ट्र के रूप में माना जाता था सच तो यह है कि यह देश भी उतना ही बौद्ध है जितना हिंदू। 17वीं शताब्दी से पहले गृहेश्वरी मंदिर का स्थान प्राचीन तांत्रिक साधको, योगिनियों और सिद्धों से जुड़ा एक पवित्र स्थल था जो वहां ध्यान करते थे। हालांकि जैसे पहले बताया वर्तमान संरचना का निर्माण 17वीं साड़ी में राजा प्रतापमाल द्वारा किया गया। इस स्थान का महत्व हिंदू धर्म ग्रंथो और एक शक्तिपीठ के रूप में इसकी पहचान से उपजता है, जहां माना जाता है कि सती देवी के घुटने गिरे थे। जिससे यह तांत्रिक पूजा और दिव्य महिला ऊर्जा का केंद्र बन गया। यह मंदिर देवी के सपाट, जमीनी स्तर के प्रतिनिधित्व के लिए विशिष्ट है और आध्यात्मिक जागृति, आंतरिक शक्ति और छिपी बाधाओं और बुरी ऊर्जाओं से सुरक्षा प्रदान करने के लिए पूजनीय है। गुह्येश्वरी शक्तिपीठ मंदिर की वास्तुकला आमतौरपर भारतीय मंदिर जो कई सौ साल पहले बने हैं वह आकार में बेहद विशाल होते हैं किंतु उन मंदिरों की तुलना में आकार में मामूली होने के बावजूद, गुह्येश्वरी मंदिर की वास्तुकला में गहन आध्यात्मिक प्रतीकवाद है। पारंपरिक नेवारी पैगोडा शैली में निर्मित इस मंदिर में एक स्तरित छत, सुनहरे कलश और उत्कृष्ट नक्काशीदार लकड़ी के खंभे हैं जो देवताओं और तांत्रिक रूपांकनों को दर्शाते हैं। सबसे उल्लेखनीय पहलू गर्भगृह के अंदर है,  जहाँ पत्थर या धातु की मूर्ति के बजाय, देवी को एक कलश या पवित्र जल पात्र के माध्यम से दर्शाया गया है। यह सृष्टि के गर्भ का प्रतीक है, जो मंदिर के तांत्रिक और स्त्री सार के साथ पूरी तरह से मेल खाता है। एक शांत प्रांगण, पवित्र घंटियाँ, और पृष्ठभूमि में निरंतर बहती बागमती नदी, शांत लेकिन आध्यात्मिक रूप से आवेशित वातावरण को बढ़ाती हैं जिसे भक्त गहराई से महसूस करते हैं। गुह्येश्वरी शक्तिपीठ मंदिर के बारे में दंत कथाएं भारतीय सनातन संस्कृति की धरोहरों में किसी एक चीज को ज्ञान का महासागर बनाना हो तो शायद से वह कठिन होगा। चार वेद 18 पुराण 108 उपनिषद और कई सारे धर्म ग्रंथो में इतना ज्ञान भरा पड़ा है की जिसकी कोई सीमा नहीं है इसीलिए तो इसे महासागर की उपमा दी गई है। उन्हें में से एक है मेर तंत्र और स्कंद पुराण उनके हिमवतखंड के अनुसार गृहिस्वारी मंदिर वह स्थान है जहां सती माता का गुदा और मलाशय गिरा था। कुछ इसी प्रकार का विवरण देवमाला वंशावली, भाषा वंशावली और स्वस्थानी व्रतकथा में भी मिलता है। ये ग्रंथ इस मंदिर को सती के गुह्य या गुदा के गिरने का स्थान बताते हैं और देवी को गुह्यकाली, गुह्येशी, गुह्येश्वरी, गुह्यकेश्वरी और गुह्यकालिका जैसे विभिन्न नामों से संबोधित करते हैं। मंथनभैरव तंत्र में गुह्येश्वरी के पति का उल्लेख पशुपति के रूप में किया गया है। वाराही तंत्र इस बात को नज़रअंदाज़ करता है कि सती के शरीर का कौन सा अंग गिरा था। इसमें “नेपाल गुह्यमंडलम्” का उल्लेख है, अर्थात ‘नेपाल का गुह्य मंडल’ अन्य स्थानों की तुलना में 1 करोड़ गुना पुण्य प्रदान करने वाला है और कहा गया है कि गुह्येश्वरी से बड़ा कोई शक्तिपीठ नहीं है। गुह्येश्वरी मंदिर को तंत्र चूड़ामणि के पीठनिर्णय में … Read more

Kamakhya Devi Mandir : कामाख्या देवी मंदिर के बारे में जानकारी, प्रसाद व्यवस्था, आरती, दर्शन का समय, नीति नियम और त्यौहार

कामाख्या देवी मंदिर इसे आप तांत्रिकों का मंदिर कहानी या मां सती की योनि का मंदिर बात तो एक ही है। इस ब्लॉग में आपको Kamakhya Devi Mandir से जुड़ी हर एक जानकारी मिल जाएगी जैसे की मंदिर का इतिहास मंदिर में चलने वाले कुछ अनोखे अनुष्ठान, मंदिर में क्यों मांसाहारी प्रसाद चढ़ाया जाता है? मंदिर के आसपास घूमने की जगह मंदिर पहुंचने का बेहतरीन समय। मंदिर से जुड़ी हर एक जानकारी के लिए इस ब्लॉग को पूरा पढ़ें। कामाख्या देवी मंदिर के बारे में जानकारी भारत में काला जादू करने वाले सबसे अधिक लोग ऐसा माना जाता है कि कोलकाता में रहते हैं परंतु भारत में काला जादू करने की राजधानी मियोंग को माना जाता है जो असम का एक छोटा सा गांव है। इसी वजह से असम में काला जादू से संबंधित कई सारी जगह है और उसमें से ही एक जगह है 51 शक्तिपीठों में से एक “कामाख्या देवी मंदिर”। कामाख्या देवी मंदिर असम की राजधानी दिसपुर के पास गुवाहाटी से 8 किलोमीटर दूर कामाख्या में है परंतु कामाख्या से भी 10 किलोमीटर की दूरी पर निलाचल पर्वत पर यह मंदिर स्थित है जिसे देवी सती का मंदिर माना जाता है। यह मंदिर पहाड़ी पर स्थित होने के कारण इसका तांत्रिक गतिविधियों से संबंध होना आश्चर्य की बात नहीं है। यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में सर्वोच्च स्थान रखता है और यहीं पर भगवती की महामुद्रा स्थित है। ऐसा माना जाता है कि जो भी बाहर से आए भक्तगण जीवन में तीन बार इस मंदिर के दर्शन कर ले उनको सांसारिक भाव बंधन में से मुक्ति मिल जाती है। शंकरी देवी शक्तिपीठ मंदिर : Click Here कात्यायनी शक्ति पीठ मंदिर : Click Here विशालाक्षी शक्तिपीठ मंदिर : Click Here शारदा शक्तिपीठ मंदिर : Click Here वैष्णो देवी मंदिर : Click Here ज्वाला देवी मंदिर : Click Here चिंतपूर्णी शक्तिपीठ मंदिर : Click Here जेशोरेश्वरी काली मंदिर : Click Here कालीघाट शक्ति पीठ : Click Here शाकम्भरी माता मंदिर : Click Here नैना देवी मंदिर : Click Here त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ मंदिर : Click Here नर्तियांग दुर्गा मंदिर : Click Here कामाख्या देवी मंदिर का पौराणिक महत्व अम्बूवाची पर्व के दौरान मां भगवती राजसविला होती है यानी की माता का मासिक धर्म शुरू होता है और मां भगवती की गर्भ गुरु स्थित महामुद्रा यानी की योनि तीर्थ से निरंतर तीन दिनों तक जल प्रवाह के स्थान से रक्त प्रवाहित होता है। कलयुग के समय में यह अपने आप में ही एक अद्भुत और अद्वितीय समय होता है इस बारे में कई सारी किताबों में लिखा गया है। साल का यह समय तांत्रिक गतिविधियां करने वाले लोगों के लिए किसी सुनहरे अवसर से काम नहीं है क्योंकि इन तीन दिनों तक वह कठिन साधना करते हैं। “राजेश्वरी कामाख्या रहस्य” एवं “10 महाविद्याओं” नामक ग्रंथ के रचयिता एवं मां कामाख्या के अनन्य भक्त ज्योतिषी एवं वास्तु विशेषज्ञ डॉक्टर दिवाकर शर्मा ने इस बारे में खुलकर बात की थी। उन तीन दिनों के बाद मां भगवती की राजस्वला समाप्ति पर उनकी विशेष पूजा एवं साधना की जाती है। माता के बारे में कई सारी दंतकथाओं में से एक बेहद प्रचलित दंतकथा यह है कि घमंड में चूर असुर राज नरकासुर एक दिन मां भगवती कामाख्या को अपनी पत्नी के रूप में पानी का दुराग्रह कर बैठा था। कामाख्या महामाया ने नरकासुर की मृत्यु को निकट मानकर उससे कहा कि यदि तुम इस रात में नील पर्वत पर चारों तरफ पत्थरों के चार सोपान पथो का निर्माण कर दो एवं कामाख्या मंदिर के साथ एक विश्राम गृह बनवा दो तो मैं तुम्हारी इच्छा अनुसार पत्नी बन जाऊंगी और यदि तुम ऐसा ना कर पाए तो तुम्हारी मौत निश्चित है। गर्भ में कर असुर ने पाठों के चारों सोपान प्रभात होने से पर्व पूर्ण कर दिए और विश्राम कक्ष का निर्माण कर ही रहा था कि महामाया के एक मायावी मुर्गी द्वारा रात्रि समाप्ति की सूचना दी गई जिससे नरकासुर ने क्रोधित होकर मुर्गी का पीछा किया और ब्रह्मपुत्र के दूसरे छोर पर जाकर उसका वध कर डाला। यह स्थान आज भी “कुक्टाचकि” के नाम से प्रचलित है। उसके बाद मां भगवती की माया से भगवान विष्णु ने नरकासुर का वध किया उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र भगदत कामरूप का राजा बन गया। भगदत का वंश लुप्त हो जाने से कामरूप राज्य छोटे-छोटे भागों में बट गया और सामंत राजा कामरूप पर अपना शासन करने लगा। ऐसा माना जाता है कि नरकासुर के नीचे कार्यों के बाद एवं वशिष्ठ मुनि के अभिशाप से देवी प्रकट हो गई थी और कामदेव द्वारा प्रतिष्ठित कामाख्या मंदिर ध्वसंप्राय हो गया था। दिवाकर शर्मा जी के अनुसार आद्या शक्ति मा भैरवी कामाख्या के दर्शन से पर्व महाभैरव उमानंद का दर्शन करना आवश्यक है जो की गुवाहाटी शहर के निकट ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य भाग में टपू के ऊपर स्थित है। यह एक प्राकृतिक शैलदिप है जो तंत्र का सर्वोच्च सिद्ध सती का शक्तिपीठ है इस टापू को मध्यांचल पर्वत के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यही पर समाधिस्थ सदाशिव को कामदेव ने कामबाण मार कर आहत किया था और समाधि से जागृत होने पर सदा शिव ने उसे भस्म कर दिया था। भगवती के महा तीर्थ नीलांचल पर्वत पर ही कामदेव को पुनः जीवनदान मिला था इसलिए ली यह क्षेत्र कामरूप के नाम से भी जाना जाता है। कामाख्या देवी मंदिर में प्रसाद व्यवस्था भारत में ज्यादातर ऐसे मंदिर है जहां प्रसाद शाकाहारी होता है लेकिन कुछ चुनिंदा मंदिर ऐसे हैं जहां पर मांसाहारी प्रसाद अर्पण किया जाता है‌। मां कामाख्या देवी मंदिर में भी प्रसाद शाकाहारी और मांसाहारी होता है। दोपहर 12:00 से 3:00 के बीच शाकाहारी प्रसाद में खिचड़ी खीर मिश्रित सब्जियां और पापड़ शामिल है। मंदिर के विशिष्ट समय पर बिना प्याज और लहसुन के बकरे का मांस और मछली का प्रसाद भी चढ़ाया जाता है, यह मंदिर तांत्रिक विद्या उसे जुड़ा है और इन विधाओं में पशुओं की बलि दी जाती है इसीलिए सदियों से मां कामाख्या को प्रसाद के रूप में मांसाहार दिया जाता है। वार्षिक अंबुबाची उत्सव के बाद यानी की तीन दिनों का माता का मासिक खत्म होने के बाद उनको जी सफेद कपड़े से ढाका जाता है वह सफेद कपड़ा लाल हो जाता है जो माना जाता है कि … Read more

Nartiang Durga Temple : नर्तियांग दुर्गा शक्तिपीठ मंदिर का इतिहास, प्रसाद व्यवस्था, आरती, दर्शन का समय, नीति नियम और त्यौहार

हनुमान न्यूज़ में आपका स्वगत है। यहां पर आपको इस नर्तियांग दुर्गा मंदिर (Nartiang Durga Temple) से जुड़ी हर जानकारी मिलेगी। जैसे की मंदिर का इतिहास, पूजा का समय, आसपास घूमने की अच्छी जगह, जाने का बेहतरीन समय और भी बहुत कुछ। मेघालय स्थित श्री नर्तियांग दुर्गा मंदिर गहन आध्यात्मिक भक्ति और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। सदियों पुराना और पवित्र शक्तिपीठों में से एक माना जाने वाला यह मंदिर, आगंतुकों को हिंदू पौराणिक कथाओं और धार्मिक परंपराओं की गहन यात्रा कराता है।अपने धार्मिक महत्व के अलावा, मंदिर का शांत परिवेश और विस्तृत दृश्य इसकी सुंदरता को और बढ़ाते हैं, यह एक ऐसा स्थान प्रदान करता है जहाँ इतिहास, आध्यात्मिकता और प्राकृतिक सौंदर्य का संगम होता है। चाहे आप त्योहारों में शामिल हों, स्थानीय कहानियाँ सीखें, या बस शांत वातावरण का आनंद लें, इस मंदिर के दर्शन एक यादगार और समृद्ध अनुभव सुनिश्चित करते हैं। इन सब के बारे में और गहन जानकारी आपको आगे प्राप्त होगी। शंकरी देवी शक्तिपीठ मंदिर : Click Here कात्यायनी शक्ति पीठ मंदिर : Click Here विशालाक्षी शक्तिपीठ मंदिर : Click Here शारदा शक्तिपीठ मंदिर : Click Here वैष्णो देवी मंदिर : Click Here ज्वाला देवी मंदिर : Click Here चिंतपूर्णी शक्तिपीठ मंदिर : Click Here जेशोरेश्वरी काली मंदिर : Click Here कालीघाट शक्ति पीठ : Click Here शाकम्भरी माता मंदिर : Click Here नैना देवी मंदिर : Click Here त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ मंदिर : Click Here नर्तियांग दुर्गा मंदिर के बारे में जानकारी नार्तियांग दुर्गा मन्दिर 51 शक्तिपीठों में से एक मंदिर है जो मेघालय राज्य के पश्चिम के जयन्तिया हिल्स ज़िले में स्थित एक 600 वर्ष पुराना मन्दिर है। भारत में एक समुदाय है जिसका नाम है प्नार समुदाय यह समुदाय के लोग विशेष रूप से जयन्तिया पहाड़ी को एक तीर्थ स्थल स्वरूप मानते हैं न केवल यह समुदाय के लोग परंतु देशभर के श्रद्धालुओं के लिए दुर्गा पूजा करने के लिए यह प्रमुख स्थान माना जाता है। नार्तियांग की शक्ति को जयंती के रूप में पूजा जाता है माना जाता है कि यहां देवी सती की बाई जांघ गिरी थी। नर्तियांग दुर्गा मंदिर का इतिहास (History of Nartiang Durga Temple) जयंतिया के राजा धन माणिक ने 1596-1612 के दौरान यानी की ने लगभग 600 वर्ष पूर्व नार्तियांग को जयंतिया साम्राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया था। जयंतिया के राजा जसो माणिक 1606-1641 के बीच हिंदू कोच राजा नर नारायण की पुत्री लक्ष्मी नारायण से विवाह किया था। ऐसा माना जाता है कि उनकी पत्नी लक्ष्मी नारायण ने ही जयंतिया राजघराने के राजा जसो माणिक और उनके गोत्र को हिंदू धर्म के शक्ति संप्रदाय को अपनाने के लिए प्रेरित किया था क्योंकि वह स्वयं देवी दुर्गा की परम भक्त थीं। एक प्रचलित दंत कथा के अनुसार, एक रात देवी ने जसो माणिक को स्वप्न में दर्शन दिए और अपने और जगह के महत्व के बारे में बताया साथ ही इस जगह एक मंदिर बनाने को कहा। इसके बाद, नार्तियांग में जैंतेश्वरी मंदिर की स्थापना की गई। मंदिर की संरचना देखने के बाद यह पता चलता है कि मंदिर राजाओं के किले का हिस्सा रहा होगा। नर्तियांग दुर्गा मंदिर में प्रसाद व्यवस्था यह मंदिर भारत के उन चुनिंदा मंदिरों में से एक है जहां पर पशु बलि दी जाती है। इस मंदिर के अनुष्ठानों में पशु बलि की प्रथा एक प्रमुख हिस्सा है कई वर्षों पहले मानव बलि की प्रथा थी लेकिन अंग्रेजों ने इस प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया था। आजकल बकरियां और बत्तखों की बलि दी जाती है और अनुष्ठान से पहले बकरियों को मानव मुखोटे पहनाए जाते हैं। दूसरी तरफ यहां केले के पत्तों की पूजा की जाती है वार्षिक दुर्गा पूजा के दौरान किले के पौधों को देवी के रूप में सजा कर उनकी पूजा की जाती है त्योहार के बाद इसे मिंटडू नदी में औपचारिक रूप से विसर्जित कर दिया जाता है। नार्तियांग की प्रसाद प्रणाली हिंदू और खासी जनजातीय रीति-रिवाजों के मिश्रण से काफी प्रभावित है। नर्तियांग दुर्गा मंदिर में आरती और दर्शन का समय सामान्य रूप से मंदिर का समय सुबह 6 से दोपहर 12:00 तक और दोपहर 3 से रात 9:00 बजे तक होता है लेकिन खास त्यौहारों के दौरान समय में बदलाव हो सकता है। मंदिर में तकरीबन सुबह 7:00 बजे उषाकाल पूजा दोपहर लगभग 11:30 बजे उच्चकाल पूजा और शाम 6:30 बजे और 7:30 बजे दो संध्याकालीन पूजा होती है। नर्तियांग दुर्गा मंदिर के नीति नियम मंदिर के कुछ नियम है जो आमतौर पर सभी हिंदू मंदिरों में होते हैं जैसे शालीन कपड़े पहनना यानी कि कंधे और घुटने ढक जाए वैसे कपड़े पहनना।फोटोग्राफी करने से पहले अनुमति ले, मंदिर के आंतरिक गर्भ ग्रुप में प्रवेश करने से पहले अपने जूते उतारे जैसे सामान्य नीति नियम है। नर्तियांग दुर्गा मंदिर के त्यौहार नार्तियांग शक्तिपीठ में मनाया जाने वाला एक मुख्य त्यौहार है दुर्गा पूजा जो खासी और बंगाली परंपराओं के साथ अनोखे ढंग से मनाया जाता है। त्योहार के दौरान मां की मूर्ति की पूजा ना करते हुए यहां देवी का प्रतिनिधित्व करने के लिए गेंदे के फूलों से सजे केले के तनो की पूजा की जाती है। इस उत्सव में स्थानीय सरदार द्वारा बलिदान पारंपरिक मंत्रोचार और तोपों की सलामी के साथ केले के तने को मिंटडू नदी में औपचारिक रूप से विसर्जित करने के साथ समापन होता है। नर्तियांग दुर्गा मंदिर के आसपास घूमने की जगह (1) नार्तियांग मोनोलिथ: नार्तियांग मोनोलिथ मेघालय के पश्चिम जयंतिया हिल्स में स्थित ऐतिहासिक पत्थर की संरचनाओं का एक विशाल संग्रह है जो जयंती या राजाओं की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी। यह 1500 ईस्वी 1835 ईस्वी के बीच में विभिन्न उद्देश्यों के लिए बनाए गए थे और इन्हें क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के रूप में देखा जाता है। जहां पर आने के लिए शिलांग से आपको सड़क मार्ग की व्यवस्था उचित रहती है। शिलांग से यह जगह तकरीबन 60 किलोमीटर की दूरी पर है। शिलांग में आपको हवाई अड्डा और रेलवे स्टेशन मिल जाएंगे जहां पर आप भारत के किसी भी कोने से आ सकते हैं। (2) थाडलस्केइन झील: थाडलस्केइन झील पश्चिम जयंतिया हिल्स जिले में स्थित एक कृत्रिम और ऐतिहासिक झील है जो लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग 6 के पास स्थित है और एक शांत सरगम स्थान है जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और स्थानीय … Read more

Tripurmalini Shakti Peeth : त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ मंदिर के बारे में जानकारी, इतिहास, प्रसाद व्यवस्था, आरती और दर्शन का समय

हनुमान न्यूज़ में आपका स्वागत है। यहां पर आपको इस त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ मंदिर (Tripurmalini Shakti Peeth) का पूर्ण इतिहास, इसमें किए जाने वाली पूजा, त्योहार, कुछ अनसुनी बातें, मंदिर के आसपास घूमने की अच्छी जगह, रहने और खाने की व्यवस्था, जैसी कई सारी चीजों के बारे में जानकारी मिलेगी। त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ मंदिर के बारे में जानकारी त्रिपुरमालिनी शक्ति पीठ भारतीय उपमहाद्वीप में फैले 51 शक्तिपीठों में से एक है। ऐसा माना जाता है कि ये पवित्र स्थल वे स्थान हैं जहाँ भगवान शिव द्वारा देवी सती के निर्जीव रूप को धारण करने और तांडव नृत्य करने के बाद उनके शरीर के अंग गिरे थे। त्रिपुरमालिनी शक्ति पीठ का हिंदू पौराणिक कथाओं में एक विशेष स्थान है और यह दिव्य स्त्री शक्ति का आशीर्वाद पाने वाले भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है। शंकरी देवी शक्तिपीठ मंदिर : Click Here कात्यायनी शक्ति पीठ मंदिर : Click Here विशालाक्षी शक्तिपीठ मंदिर : Click Here शारदा शक्तिपीठ मंदिर : Click Here वैष्णो देवी मंदिर : Click Here ज्वाला देवी मंदिर : Click Here चिंतपूर्णी शक्तिपीठ मंदिर : Click Here जेशोरेश्वरी काली मंदिर : Click Here कालीघाट शक्ति पीठ : Click Here शाकम्भरी माता मंदिर : Click Here नैना देवी मंदिर : Click Here त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ मंदिर का इतिहास त्रिपुरमालिनी शक्ति पीठ की कथा हिंदू पौराणिक कथाओं में गहराई से निहित है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि देवी सती का बायाँ पैर इसी स्थान पर गिरा था। इस शक्ति पीठ की अधिष्ठात्री देवी को त्रिपुरमालिनी के नाम से जाना जाता है, जबकि भगवान शिव की यहाँ त्रिपुरांतक के रूप में पूजा की जाती है। त्रिपुरमालिनी शक्ति पीठ का महत्व दिव्य स्त्री ऊर्जा और भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करने की उनकी शक्ति से जुड़ा है। ऐसा कहा जाता है कि इस पवित्र स्थल पर देवी की पूजा करने से समृद्धि आती है, विघ्न दूर होते हैं और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है। त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ मंदिर में प्रसाद व्यवस्था भक्त आमतौर पर पारंपरिक तरीके से प्रसाद चढ़ाते हैं, जिसमें‌ मां त्रिपुरमालिनी‌ को फल, मिठाई या फूल जैसी विशिष्ट वस्तुएँ अर्पित की जाती हैं और प्रसाद वापस प्राप्त किया जाता है। भक्त सीधे देवता को प्रसाद चढ़ा सकते हैं या मंदिर के बाहर लगे स्टॉल से पहले से पैक किया हुआ प्रसाद खरीदकर घर ले जा सकते हैं या मंदिर में खा सकते हैं। त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ मंदिर में आरती और दर्शन का समय जालंधर स्थित त्रिपुर मालिनी शक्ति पीठ में दर्शन का समय आमतौर पर सुबह 6 बजे से रात 8 बजे तक होता है। मंदिर में दिन भर में आरती के विभिन्न समय भी होते हैं, जिनमें शामिल हैं: भस्म आरती: सुबह 4 बजे से सुबह 6 बजे तक नैवद्य आरती: सुबह 7:30 बजे से सुबह 8:15 बजे तक महाभोग आरती: सुबह 10:30 बजे से सुबह 11:15 बजे तक संध्या आरती: शाम 6:30 बजे से शाम 7:15 बजे तक। सबसे सटीक और नवीनतम समय-सारिणी के लिए इन समयों की सीधे मंदिर से पुष्टि करना हमेशा बेहतर होता है। त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ मंदिर के नीति नियम त्रिपुरा मालिनी शक्ति पीठ के लिए कोई आधिकारिक रूप से प्रलेखित नियम और विनियम नहीं हैं, भारत में शक्ति पीठों और मंदिरों में जाने के सामान्य दिशानिर्देशों में कंधे और घुटने ढकना, प्रवेश करने से पहले जूते उतारना, धार्मिक भावनाओं का सम्मान करना और शांतिपूर्ण व्यवहार शामिल हैं। भक्त विशेष पूजा करने के बारे में मंदिर कार्यालय में पूछताछ कर सकते हैं। सामान्य मंदिर शिष्टाचार: विनम्र पोशाक पहनें: पवित्र स्थान के प्रति सम्मान दिखाने के लिए पुरुषों और महिलाओं दोनों को अपने कंधे और घुटने ढके होने चाहिए। जूते उतारें: मंदिर परिसर में प्रवेश करने से पहले अपने जूते उतारने की प्रथा है। शांति बनाए रखें: आगंतुकों से अपेक्षा की जाती है कि वे धार्मिक माहौल और दूसरों की भावनाओं का सम्मान करें। स्वच्छता बनाए रखें: मंदिर परिसर में स्वच्छता बनाए रखने में मदद करें। धार्मिक भावनाओं का सम्मान करें: सभी धर्मों के आगंतुकों का स्वागत है, लेकिन उन्हें हिंदू धर्म और उसकी प्रथाओं के प्रति सम्मान दिखाना होगा। त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ मंदिर की वास्तुकला और मंदिर संरचना त्रिपुरमालिनी शक्ति पीठ मंदिर पारंपरिक और आधुनिक स्थापत्य शैलियों का मिश्रण प्रस्तुत करता है। मुख्य मंदिर में देवी त्रिपुरमालिनी की मूर्ति स्थापित है, जो जीवंत रंगों और जटिल नक्काशी से सुसज्जित है। मंदिर की प्रमुख विशेषताओं में शामिल हैं: विस्तृत मूर्तियों वाला एक भव्य प्रवेश द्वार (गोपुरम) भक्तों के एकत्र होने और ध्यान करने के लिए विशाल प्रांगण हिंदू पौराणिक कथाओं के दृश्यों को दर्शाती दीवारों पर जटिल नक्काशी अनुष्ठानिक स्नान के लिए एक पवित्र जल कुंड भगवान शिव और अन्य देवताओं के लिए अलग-अलग मंदिर मंदिर परिसर में तीर्थयात्रियों के ठहरने के लिए एक धर्मशाला और एक सामुदायिक रसोईघर (लंगर) भी है जहाँ आगंतुकों को निःशुल्क भोजन परोसा जाता है। त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ मंदिर का अनुष्ठान और पूजा त्रिपुरमालिनी शक्ति पीठ में आने वाले भक्त देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए विभिन्न अनुष्ठानों और पूजा पद्धतियों में भाग लेते हैं। कुछ सामान्य प्रथाएँ इस प्रकार हैं: अभिषेक: दूध, घी, शहद और अन्य पवित्र पदार्थों से देवी का अनुष्ठानिक स्नान अर्चना: देवी को फूल, फल और अन्य वस्तुएँ अर्पित करना आरती: भक्ति गीतों के साथ दीप प्रज्वलित करना प्रदक्षिणा: मुख्य मंदिर की परिक्रमा जप: मंत्रों या देवी के नाम का जाप इन अनुष्ठानों को सही ढंग से करने के लिए मंदिर के पुजारियों से परामर्श करना उचित है। त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ मंदिर के त्यौहार 1. नवरात्रि: देवी को समर्पित नौ दिवसीय उत्सव, जो वर्ष में दो बार मनाया जाता है। (आमतौर पर मार्च-अप्रैल और सितंबर-अक्टूबर में) 2. दुर्गा पूजा: देवी का सम्मान करने वाला एक और महत्वपूर्ण त्योहार, जो आमतौर पर सितंबर या अक्टूबर में मनाया जाता है। त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ मंदिर के आसपास घूमने की जगह: त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ मंदिर के आसपास घूमने की जगह निम्नलिखित है: (1) रंगला पंजाब हवेली: जालंधर में रंगला पंजाब हवेली एक सांस्कृतिक संग्रहालय और पारंपरिक गाँव है जो भांगड़ा और गिद्दा जैसे लाइव नृत्य प्रदर्शनों, कठपुतली शो, काम पर कारीगरों और ऊंट और घोड़े की सवारी जैसी गतिविधियों के माध्यम से पंजाबी जीवन, इतिहास और संस्कृति को प्रदर्शित करता है। इसमें एक पारंपरिक रेस्तरां भी है जो प्रामाणिक पंजाबी व्यंजन, बिक्री के लिए पारंपरिक कलाकृतियाँ और ग्रामीण गतिविधियों की मूर्तियां पेश करता है। प्रवेश शुल्क … Read more

Naina Devi : नैना देवी शक्तिपीठ मंदिर के बारे में जानकारी, इतिहास, आरती, दर्शन का समय, प्रसाद व्यवस्था, नीति नियम, मंदिर के त्योहार और आसपास घूमने की जगह

हनुमान न्यूज़ में आपका स्वागत है। यहां पर आपको इस नैना देवी मंदिर (Naina Devi) का पूर्ण इतिहास, इसमें किए जाने वाली पूजा, त्योहार, कुछ अनसुनी बातें, मंदिर के आसपास घूमने की अच्छी जगह, रहने और खाने की व्यवस्था, जैसी कई सारी चीजों के बारे में जानकारी मिलेगी। नैना देवी मंदिर के बारे में जानकारी देवी दुर्गा को समर्पित, नैना देवी मंदिर भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहाँ देवी पिंडी के रूप में विराजमान हैं।ऐसा माना जाता है कि मंदिर वह स्थान है जहाँ देवी की आँखें गिरी थीं। राक्षस महिषासुर से जुड़े होने के कारण मंदिर को महिषपीठ भी कहा जाता है।नैना देवी मंदिर हिंदुओं के लिए सबसे पवित्र स्थानों में से एक है। मुख्य मंदिर में तीन स्वर्गीय देवताओं, देवी काली, देवी नैना देवी और भगवान गणेश की प्रतिमाएँ हैं। शंकरी देवी शक्तिपीठ मंदिर : Click Here कात्यायनी शक्ति पीठ मंदिर : Click Here विशालाक्षी शक्तिपीठ मंदिर : Click Here शारदा शक्तिपीठ मंदिर : Click Here वैष्णो देवी मंदिर : Click Here ज्वाला देवी मंदिर : Click Here चिंतपूर्णी शक्तिपीठ मंदिर : Click Here जेशोरेश्वरी काली मंदिर : Click Here कालीघाट शक्ति पीठ : Click Here शाकम्भरी माता मंदिर : Click Here नैना देवी मंदिर का इतिहास [1] श्री नैना देवी मंदिर की कथा, महिमा और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: भारतीय धार्मिक ग्रंथों, किंवदंतियों और लोककथाओं में देवी सती, भगवान शिव, भगवान विष्णु तथा महिषासुर से जुड़ी अनेक अद्भुत कथाएँ मिलती हैं, जिनके आधार पर भारत के अनेक तीर्थ और शक्तिपीठ बने।इन्हीं में से एक प्रमुख शक्तिपीठ है श्री नैना देवी मंदिर, जो हिमाचल प्रदेश में शान से स्थित है और जहाँ श्रद्धालु देवी के दिव्य नेत्रों की पूजा करते हैं। [2] देवी सती और शक्तिपीठों का उद्भव: किंवदंती के अनुसार, जब राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया, तब उन्होंने अपने जामाता भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया। इस अपमान से व्यथित होकर देवी सती ने यज्ञ में स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दिया।यह दृश्य देखकर भगवान शिव शोकाकुल हो उठे। उन्होंने सती के पार्थिव शरीर को अपने कंधे पर उठा लिया और उग्र तांडव नृत्य करना शुरू कर दिया। शिव के इस विकराल नृत्य से ब्रह्मांड में संतुलन बिगड़ने लगा और प्रलय का संकट मंडराने लगा। तब सभी देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। विष्णु ने सुदर्शन चक्र का प्रयोग कर सती के शरीर को अनेक टुकड़ों में विभाजित कर दिया। कहा जाता है कि जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरे, वहाँ शक्तिपीठ स्थापित हुए।श्री नैना देवी मंदिर उन स्थानों में से एक है जहाँ देवी सती के नेत्र गिरे थे। इसलिए यहाँ देवी की पूजा “नैना” रूप में की जाती है। भक्तों का विश्वास है कि यहाँ दर्शन करने से दृष्टि दोष, मानसिक क्लेश, भय और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है। [3] नैना देवी मंदिर की खोज “एक सरल ग्रामीण की दिव्य दृष्टि”: समय बीतने के साथ नैना देवी का प्राचीन मंदिर प्राकृतिक आपदाओं से नष्ट हो गया। कई वर्षों तक यह स्थान वीरान पड़ा रहा। तभी एक दिन एक गुर्जर समुदाय के चरवाहे बालक ने यहाँ एक अद्भुत घटना देखी। वह अपने मवेशियों को चराने आया था।उसने देखा कि एक सफेद गाय हर दिन एक पत्थर पर अपने थनों से दूध गिरा देती है। यह घटना कई दिनों तक दोहराई गई। बालक को आश्चर्य हुआ और उसने आसपास के लोगों को बताया, लेकिन किसी ने विश्वास नहीं किया। एक रात उसे स्वप्न में देवी प्रकट हुईं। देवी ने कहा कि वही पत्थर उनका दिव्य रूप है और वहाँ उनकी पूजा करनी चाहिए। बालक ने अगली सुबह राजा बीर चंद को यह दिव्य घटना बताई। राजा ने स्वयं जाकर उस स्थान का निरीक्षण किया और देवी के चमत्कार को पहचानते हुए वहाँ मंदिर निर्माण का आदेश दिया।मंदिर का नाम नैना देवी रखा गया और शीघ्र ही यह स्थान श्रद्धालुओं का प्रमुख तीर्थ बन गया। [4] महिषासुर वध और नैना देवी का स्वरूप: श्री नैना देवी मंदिर को महिषापीठ भी कहा जाता है। इसके पीछे एक और पौराणिक कथा है। कहा जाता है कि असुरों में महिषासुर सबसे शक्तिशाली था। उसे भगवान ब्रह्मा से वरदान मिला था कि वह अमर रहेगा और कोई पुरुष उसका वध नहीं कर सकता।वरदान की शर्त थी कि उसे केवल एक अविवाहित स्त्री ही पराजित कर सकती है। वरदान का लाभ उठाकर महिषासुर ने पृथ्वी और स्वर्गलोक में आतंक फैलाना शुरू कर दिया। देवता अत्यंत व्याकुल हो उठे। तब सभी देवताओं ने अपनी-अपनी शक्तियाँ मिलाकर एक अद्भुत देवी की रचना की। देवी को सभी ने दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए भगवान शिव ने त्रिशूल, भगवान विष्णु ने चक्र, भगवान इंद्र ने वज्र, वरुण ने शंख, और अन्य देवताओं ने अन्य शक्तियाँ।महिषासुर देवी की अनुपम सुंदरता से मोहित हो गया। उसने विवाह का प्रस्ताव दिया। देवी ने शर्त रखी यदि वह उन्हें युद्ध में पराजित कर देगा, तभी वे विवाह करेंगी। युद्ध कई दिनों तक चला। अंततः देवी ने महिषासुर का वध किया। कहा जाता है कि युद्ध के दौरान देवी ने उसके दोनों नेत्र निकाल लिए थे।इसी कारण देवताओं ने “जय नैना!” का उद्घोष किया और उस स्थान को नैना देवी कहा गया।यह विजय केवल युद्ध की जीत नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा और अधर्म पर विजय का प्रतीक मानी जाती है। [5] आस्था, पर्व और सांस्कृतिक महत्ता: नैना देवी मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि यह पर्वों, मेलों और सामाजिक उत्सवों का केंद्र भी है। हर वर्ष नवरात्रि के समय यहाँ विशेष पूजा, जागरण, भजन-कीर्तन और धार्मिक आयोजन होते हैं। देशभर से श्रद्धालु यहाँ दर्शनों के लिए आते हैं। भक्तों का विश्वास है कि यहाँ दर्शन करने से नेत्र रोग दूर होते हैं, मानसिक संतुलन प्राप्त होता है, संतान सुख मिलता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।कई लोग मनोकामना पूर्ति के लिए यहाँ दीप जलाते हैं, विशेष पूजा कराते हैं और दान-पुण्य करते हैं।स्थानीय लोग इसे अपनी परंपरा का गौरव मानते हैं। गुर्जर समुदाय से लेकर विभिन्न जातियों और धर्मों के लोग यहाँ आकर देवी की शरण में आते हैं। नैना देवी का पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सामाजिक एकता का प्रतीक भी बन चुका है। श्री नैना देवी जी का मंदिर उत्तर भारत के सर्वाधिक पूजनीय और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक है। यह … Read more

Shakambari Mata Mandir : शाकम्भरी शक्तिपीठ मंदिर में आरती, दर्शन का समय, प्रसाद व्यवस्था, नीति नियम, त्योहार और आसपास घूमने की जगह

हनुमान न्यूज़ में आपका स्वागत है। यहां पर आपको इस शाकम्भरी शक्तिपीठ मंदिर (Shakambari Mata Mandir) का पूर्ण इतिहास, इसमें किए जाने वाली पूजा, त्योहार, कुछ अनसुनी बातें, मंदिर के आसपास घूमने की अच्छी जगह, रहने और खाने की व्यवस्था, जैसी कई सारी चीजों के बारे में जानकारी मिलेगी। श्री शाकम्भरी माता मंदिर की श्रद्धा, चमत्कार और ऐतिहासिक धरोहर श्री शाकम्भरी माता दुर्गा के अवतारों में से एक महत्वपूर्ण रूप हैं। देवी के अनेक रूपों में से रक्तदंतिका, भीमा, भ्रामरी, शताक्षी और शाकम्भरी विशेष रूप से पूजनीय हैं।पूरे भारत में माता शाकम्भरी के तीन प्रमुख शक्तिपीठ प्रसिद्ध हैं। पहला राजस्थान के सीकर जिले में उदयपुरवाटी के पास सकराय गांव में स्थित है, जिसे स्थानीय लोग “सकराय मां” के नाम से जानते हैं। दूसरा स्थान भी राजस्थान में, सांभर जिले के समीप शाकंभर नाम से प्रसिद्ध है, जबकि तीसरा मंदिर उत्तर प्रदेश में सहारनपुर से लगभग 42 किलोमीटर दूर, बेहट कस्बे से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।ये तीनों शक्तिपीठ न केवल धार्मिक आस्था के केंद्र हैं बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। शंकरी देवी शक्तिपीठ मंदिर : Click Here कात्यायनी शक्ति पीठ मंदिर : Click Here विशालाक्षी शक्तिपीठ मंदिर : Click Here शारदा शक्तिपीठ मंदिर : Click Here वैष्णो देवी मंदिर : Click Here ज्वाला देवी मंदिर : Click Here चिंतपूर्णी शक्तिपीठ मंदिर : Click Here जेशोरेश्वरी काली मंदिर : Click Here कालीघाट शक्ति पीठ : Click Here (1) माता शाकम्भरी की पौराणिक कथा: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शाकुम्भरा देवी ने 100 वर्षों तक कठोर तपस्या की। तपस्या के दौरान वे केवल महीने के अंत में एक बार शाकाहारी भोजन ग्रहण करती थीं।उस समय यह क्षेत्र पूरी तरह निर्जन था न पानी था, न वृक्ष, न जीवन का कोई चिह्न। किंतु माता की तपस्या से प्रभावित होकर उस निर्जन स्थान पर धीरे-धीरे पेड़-पौधों की उत्पत्ति हुई और वहाँ हरियाली छा गई। इसके बाद साधु-संत और भक्त इस चमत्कार को देखने वहाँ आने लगे। कहा जाता है कि माता ने उन्हें शाकाहारी भोजन प्रदान किया, जिससे यह संकेत मिला कि वे केवल शाकाहारी भोजन का भोग स्वीकार करती हैं।इसी चमत्कार के बाद देवी को “शाकम्भरी माता” कहा जाने लगा। कथाओं में यह भी आता है कि इस क्षेत्र में आदि शंकराचार्य ने तपस्या की थी। शाकम्भरी देवी को तीन शक्तिरूपों ब्रह्मी देवी, भीमा देवी और शीतला देवी का स्वरूप माना जाता है।उनकी कृपा से जीवन में शुद्धता, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है। (2) महाभारत से जुड़ी मान्यता: स्थानीय परंपराओं के अनुसार, महाभारत काल में पांडवों ने युद्ध में अपने परिजनों के वध के पाप से मुक्ति पाने के लिए अरावली की पहाड़ियों में निवास किया। युधिष्ठिर ने यहाँ पूजा-अर्चना हेतु देवी शंकरा की स्थापना की थी। समय के साथ यही स्थान श्री शाकम्भरी माता का प्रमुख तीर्थ बन गया। (3) मंदिर की संरचना और प्राचीनता: यह मंदिर सातवीं शताब्दी में निर्मित माना जाता है और भारत के आठ शक्ति पीठोंमें से एक है।मंदिर का निर्माण खंडेलवाल वैश्यों द्वारा सामूहिक रूप से धन इकट्ठा कर कराया गया था। यहाँ लगे शिलालेखों में मंदिर निर्माण में योगदान देने वाले समाज के लोगों का उल्लेख मिलता है।शिलालेखों में गणपति, नृत्यरत चंद्रिका और धनदाता कुबेर की स्तुति लिखी गई है। मंदिर परिसर में शंकरा, गणपति और कुबेर की प्राचीन प्रतिमाएँ स्थापित हैं। (4) धार्मिक केंद्र और नाथ संप्रदाय का प्रभाव: सकराय मंदिर का नाथ संप्रदाय से गहरा संबंध रहा है और आज भी यहाँ नाथ योगियों का वर्चस्व देखने को मिलता है।आसपास जटा शंकर मंदिर और श्री आत्म मुनि आश्रम जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल स्थित हैं।मंदिर के आसपास शंकर गंगा नदी बहती है, जहाँ बारिश के दिनों में स्नान हेतु विशेष घाट बनाए गए हैं।मंदिर क्षेत्र में औषधीय वृक्षों की प्रचुरता है, जो इसे प्रकृति प्रेमियों और साधकों के लिए आदर्श स्थान बनाते हैं। (5) धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता: सकराय का शाकम्भरी मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं है, बल्कि यह आस्था, तपस्या और चमत्कार का प्रतीक है।यहां आने वाले भक्त न केवल देवी की पूजा करते हैं, बल्कि प्रकृति की गोद में बैठकर आत्मचिंतन और साधना का अनुभव भी करते हैं।मंदिर की शांत वादियाँ, झरनों की ध्वनि, औषधीय वनस्पतियाँ, और मंदिर परिसर की आध्यात्मिक ऊर्जा मिलकर यहाँ का वातावरण अलौकिक बना देती हैं।यह मंदिर विशेष रूप से खंडेलवाल वैश्यों की कुल देवी के रूप में प्रसिद्ध है और सामाजिक सहभागिता का भी प्रतीक है। यहाँ का शिलालेख उस युग की संस्कृति, श्रद्धा और सामूहिक प्रयासों का प्रमाण है। शाकम्भरी देवी मंदिर में आरती और दर्शन का समय (Shakambari Mata Mandir Darshan Time) मंदिर सुबह से देर रात तक दर्शन के लिए खुला रहता है ताकि बड़ी संख्या में आने वाले भक्तों को आशीर्वाद लेने, अनुष्ठान करने या बस शांति पाने के लिए दर्शन मिल सकें।दर्शन का समय सुबह 4:00 बजे से रात 10:00 बजे तक है। ये लंबे घंटे आगंतुकों को अपनी सुविधानुसार अपनी यात्रा की योजना बनाने की अनुमति देते हैं, चाहे वे सुबह के शांत समय में आना चाहें या शाम के शांत वातावरण में। सुबह की शुरुआत आरती के पवित्र अनुष्ठान से होती है, जो सुबह 4:30 बजे से 5:00 बजे के बीच होती है। इस दौरान, मंदिर घंटियों, मंत्रोच्चार और भक्ति गीतों की ध्वनि से गूंज उठता है।दीपों और धूप की कोमल चमक एक आध्यात्मिक वातावरण बनाती है, जो भक्तों के लिए इस अनुभव को अत्यंत मार्मिक बना देती है। कई लोगों का मानना है कि सुबह की आरती देखने से दिव्य कृपा और आध्यात्मिक उत्थान प्राप्त होता है जो पूरे दिन बना रहता है।शाम को शाम की आरती के लिए मंदिर फिर से जीवंत हो उठता है, जो शाम 7:00 बजे से 7:30 बजे के बीच होती है। जैसे-जैसे सूरज डूबता है और आसमान में अंधेरा छाता है, दीपों की टिमटिमाती रोशनी और मधुर मंत्रोच्चार एक गहन और भक्तिमय वातावरण का निर्माण करते हैं।शाम की आरती भक्तों को दिन पर चिंतन करने, कृतज्ञता व्यक्त करने और आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करने का अवसर प्रदान करती है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि त्योहारों, विशेष अवसरों या धार्मिक आयोजनों के दौरान दर्शन का समय बदल सकता है।ऐसे समय में, बड़ी भीड़ इकट्ठा होती है और अतिरिक्त अनुष्ठान, प्रार्थनाएँ और उत्सव आयोजित किए जाते हैं, अक्सर आगंतुकों की आमद … Read more