हनुमान न्यूज़ में आपका स्वागत है। यहां पर आपको कंकालितला शक्तिपीठ से जुड़ी हर जानकारी मिलेगी। जैसे की मंदिर का इतिहास, जाने का बेहतरीन समय, पूजा, दर्शन, प्रसाद व्यवस्था, कुछ अनसुनी बातें और भी बहुत कुछ।
कंकालितला मंदिर का परिचय
कंकालितला मंदिर पश्चिम बंगाल के बिरभूम जिले के शांतिनिकेतन के पास स्थित एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। यह स्थान देवी सति के शरीर के कंकाल गिरने की मान्यता से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसे कंकालितला कहा जाता है। यह शक्तिपीठ अपनी तांत्रिक परंपरा, शांत प्राकृतिक वातावरण और नदी किनारे स्थित होने के कारण अत्यंत पवित्र माना जाता है।
मंदिर कोपाई नदी के तट पर बना है, जहाँ बड़ी संख्या में भक्त देवी काली/सती कंकालेश्वरी के दर्शन करने आते हैं। यहाँ मुख्य गर्भगृह में देवी का कंकालीत रूप पूजित होता है, जो शक्ति और तांत्रिक साधना का प्रतीक है। कंकालितला, शांतिनिकेतन से लगभग 8-9 किलोमीटर की दूरी पर है और विश्व भारती विश्वविद्यालय आने वाले लोग भी इसे अवश्य देखने जाते हैं।
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कंकालितला मंदिर का इतिहास (History of Kankalitala Temple)
जब राजा दक्ष ने अपने यज्ञ में भगवान शिव का अपमान किया, तो सती ने क्रोध और अपमान से व्याकुल होकर यज्ञकुंड में देह त्याग कर दिया। दुखी शिव जब सती का शरीर लेकर तांडव करते हुए ब्रह्मांड में घूम रहे थे, तब विष्णु ने जगत हित के लिए सती के शरीर के अंगों को विभिन्न स्थानों पर गिराया। इन्हीं स्थानों को शक्तिपीठ कहा जाता है।
मान्यता है कि सती का कंकाल यहाँ गिरा था, जिससे इस स्थान का नाम कंकालितला पड़ा। यहाँ देवी को “कंकालेश्वरी” या “कंकाल काली” के रूप में पूजा जाता है।
यह मंदिर प्राचीन काल से ही तांत्रिक साधु का मुख्य स्थल माना जाता है। बंगाल के कालीकुंड क्षेत्र में यह एक अत्यंत शक्तिशाली केंद्र माना जाता था। गृहतंत्र, कोलाचार और विराचार परंपरा के साधक यहां रात में साधना करते थे। कई तांत्रिक ग्रन्थो में कंकालितला को ‘कंकाल भूमि’, ‘शक्ति कांडा स्थल’ और ‘काली तट शक्ति केंद्र’ क्षेत्र भी कहा गया है। यह कोपाई नदी के किनारे पर बसा प्राचीन तीर्थ है मंदिर के स्थान पर पहले एक खुला मठ था। यहां कोई बड़ा निर्माण नहीं था। बस एक पवित्र स्थान था जहां साधक धुनी लगाकर साधना करते थे। कोपाई नदी के किनारे स्थित होने के कारण इसे पावन एवं ऊर्जावान शक्ति क्षेत्र माना जाता था।
यहां पर 17सी से 18वीं शताब्दी के दौरान पहला पक्का मंदिर बनवाया गया। बोलपुर ओर बिरभूमि के जमींदारों ने मिलकर यहां कंकालेश्वरी देवी का पहला गर्भगृह बनवाया, साथ ही में साधकों के लिए छोटा मठ और कोपाई नदी के पास पूजा स्थान भी बनवाया गया। यही कंकलितला का सबसे पहला आधिकारिक मंदिर माना जाता है। 19वीं सदी में इसका पुनः निर्माण और विस्तार किया गया। इस समय में पुराने मंदिर की मरम्मत गर्भगृह को ईंट पत्थर से मजबूत बनाना साधकों के लिए रहने की कुटिया बनाना और तांत्रिक कुंड का विस्तार करना जैसी कई सारी चीजे हुईं।
यह सब कार्यस्थानिक परिवारों और जमींदारों में करवाया। 20वीं सदी में शांतिनिकेतन के कारण प्रसिद्ध मिली। रविंद्रनाथ टैगोर और शांतिनिकेतन के कारण यह स्थान सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण बन गया। इस दौरान मंदिर की मुख्य इमारत दोबारा बनी, सभा मंडप जोड़ा गया, नया प्रवेश द्वार और प्रांगण तैयार हुआ, कोपाई नदी के किनारे घाट बने, स्थानीय समितियां और बंगाल के दानदाताओं ने मंदिर को नया रूप दिया। अब कंकालितला मंदिर में आधुनिक गर्भगृह, विस्तृत प्रांगण, तांत्रिक कुंड, सभा भवन, तीर्थ यात्रियों के लिए सुविधाएँ, नए सुरक्षा और यज्ञ स्थल बन चुके हैं। यह अब शांतिनिकेतन का प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थल है।
कंकालितला मंदिर की वास्तुकला
कंकालितला मंदिर की वास्तुकला बंगाल की पारंपरिक झोपड़ी शैली में बनी है। यह मंदिर में आपको बंगाल के ग्रामीण घरों जैसी छत दिखाई देती है, जिसे एक चला दो चला शैली कहते हैं। हल्कै ढलान वाली छत ऊपर से अर्ध गोले और साधारण निर्माण, दीवारों में छोटी और न बहुत ज्यादा अलंकरण। यह शैली बंगाल के कई प्राचीन शक्ति पीठों में मिलती है। मंदिर का मुख्य गर्भगृह छोटा शांत और गहरा है। इसमें मां की प्रतिमा नहीं बल्कि श्री श्री कंकाला की माता की पवित्र पिंडी स्थापित है। गभग्रह का फर्श काले स्लेट पत्थर से बना हुआ है जो प्राचीनता दर्शाता है। कंकालीतला की विशेषता यह है कि मंदिर के पीछे बाटी कोपी नदी धार्मिक परिप्रेक्ष्य में शामिल है।
आमतौर पर परिक्रमा मार्ग खुली जमीन पर होते हैं। नदी की और खुले स्थान पैर होते हैं जहां तांत्रिक अनुष्ठानों के लिए एक कोना जो बहुत साधारण लेकिन ऐतिहासिक है। मंदिर का अग्रभाग एक खुले आंगन या मंडप जैसे क्षेत्र से बना है जहां कीर्तन, पूजा, होम आदि क्रियाएं होती हैं। ऊपर लोहे की छत या टीन शेड जैसा कवर है जो बारिश से बचने के लिए बाद में जोड़ा गया था।
मंदिर के द्वारा शिल्प और बाहरी सजावट भी देखने लायक है क्योंकि यहां पर भव्य नक्काशी नहीं है फिर भी लाल पीली बंगाली रंगाई, प्रवेश द्वार पर साधारण बंगाली लोक ज्योतिषी चिन्ह और कहीं-कहीं तांत्रिक त्रिपुंड त्रिशूल और महाकाल चिन्ह बने हैं। यह सब इसे एक तांत्रिक प्रधान शक्तिपीठ की भावना देते हैं।
यहां तांत्रिक अनुष्ठान क्षेत्र भी है कंकालितला एक प्रमुख तांत्रिक साधना स्थान होने के कारण इसके परिसर में एक छोटा श्मशान तट जैसा क्षेत्र है, काली उपासना के लिए यहां पर अलग स्थान है और साथ ही में रात के समय तांत्रिक साधना के लिए निर्मित छोटे मंच भी हैं। यह सामान्य मंदिरों में नहीं मिलते इसलिए यह बहुत विशिष्ट विशेषता है। यह स्थान नदी के पास है इसी वजह से मंदिर का आधार भूमि बालू, लाल मिट्टी और ईंट पत्थर मिश्रित से बना है। यहां पर बारिश में बदली जाने वाली भूमि स्थित है इसी कारण मंदिर की वास्तुकला हल्की और अत्यधिक भारी नहीं बनाई गई है।
समय के साथ यह मंदिर का पुनः निर्माण भी हुआ है। प्रारंभ में मंदिर बेहद साधारण था परंतु वर्तमान में नई ईंटों और प्लास्टर से नवीनीकरण किया गया है। कुछ हिस्सों में ग्रिल और सीमेंट का उपयोग भी किया गया है लेकिन मूल ग्रामीण शैली को काफी हद तक सुरक्षित रखा गया है।
कंकालितला की दुर्लभ लोक कथाएँ
(1) कंकाल धरिणी माता का “अस्थि प्रकाश” प्रसंग:
लोक-कथा के अनुसार एक समय मंदिर क्षेत्र में एक साधक को रात में नदी के किनारे मानव अस्थियों से प्रकाश निकलते दिखाई दिया। वह प्रकाश धीरे धीरे एक स्त्री आकृति में बदल गया, जिसके हाथ में तीन वस्तुएँ थीं। एक त्रिशूल, एक कपाल और एक कंकाल था। उस आकृति ने साधक को कहा कि “यह भूमि कंकाल ऊर्जा की धरा है, इसे ‘कंकाल तला’ के रूप में पूजो।” कहा जाता है कि यही से स्थान का नाम “कंकालितला” पड़ा। इसे तांत्रिक परंपराओं में “अस्थि तत्व जागरण” माना जाता है।
(2) कोपाई नदी का ‘रंग बदलने’ वाला चमत्कार:
पुरानी लोककथा है कि दुर्गा पर्व की नवमी रात को कोपाई नदी का पानी धीरे धीरे लालिमा लिए दिखने लगता था। लोग मानते थे कि यह मां कंकाली की शक्ति की उपस्थिति का संकेत है। कई बुजुर्गों के अनुसार “नवमी की रात नदी में देवी नहाती हैं, इसलिए नदी लाल गुलाबी हो उठती है।” आज यह कम दिखाई देता है, पर कथा अब भी जीवित है।
(3) ‘कपाल-कापालि’ का अदृश्य रक्षक:
स्थानीय तांत्रिकों द्वारा सुनाई एक कथा के अनुसार मंदिर के पास एक अदृश्य कपालि जिसे कंकाल धारण करने वाला रक्षक कहते हैं जो रात में मंदिर की परिक्रमा करता है। कहते हैं कि यदि कोई बुरी नीयत से मंदिर में प्रवेश करे, या तांत्रिक क्षेत्र को अपवित्र करे तो उसे रात में भयावह सपने आते हैं और वह अगली सुबह वहाँ वापस आकर क्षमा मांगता है।
(4) खोए हुए बालक का ‘कंकाली माता द्वारा संरक्षण’:
एक दुर्लभ कथा में कहा गया है कि बहुत पहले एक छोटा बच्चा मेला भर में खो गया। रात देर तक खोजने पर वह मंदिर के गर्भगृह के सामने सोया मिला और उसके पास एक लाल चुनरी रखी थी।जब परिवार ने पुजारी से पूछा तो उन्होंने कहा: “माता स्वयं अपने बालकों को ढककर सुरक्षित रखती हैं। चुनरी उनका संकेत है।” आज भी बच्चे खोने पर लोग सबसे पहले कंकालाई माता के सामने दीप जलाते हैं।
(5) ‘नदी के नीचे दबा हुआ तांत्रिक मंडल’:
कुछ तांत्रिक साधकों का मानना है कि कंकालितला के प्राचीनतम तांत्रिकों ने कोपाई नदी के तट पर एक भूमिगत मंडल स्थापित किया था। मान्यता है कि नदी के जल में विशेष रात्रियों में एक हल्की गोल आकृति दिखाई देती है, जिसे केवल सिद्ध साधक ही देख सकते हैं।इसी मंडल से शक्तिपीठ की ऊर्जा उठती है। यह कथन ऐतिहासिक प्रमाणों के बजाय तांत्रिक लोक विश्वास है, लेकिन स्थान की रहस्यमयता इसी पर आधारित है।
(6) श्मशान-तट की ‘रुद्र हँसी’ कथा:
स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि कभी कभी अमावस्या की रात श्मशान तट की दिशा से एक अजीब ‘आर्ध हँसी, आर्ध रोने जैसी ध्वनि सुनाई देती थी। लोग इसे “मां कंकाली की उग्र ऊर्जा की ध्वनि” मानते थे। बंगाल के तांत्रिक साहित्य में इसे “रुद्र हँसी” कहा जाता है जो केवल शक्तिपीठ के तीव्र साधना स्थलों में सुनी जाती है।
(7) देवी के ‘चलित चरण’ की कथा:
एक पुरानी कथा है कि कुछ दशकों पहले मंदिर का फर्श कच्चा हुआ करता था। तब कई बार सुबह सुबह गर्भगृह के फर्श पर छोटे छोटे पदचिह्न दिखाई देते थे। यह पदचिह्न चंदन और लाल सिंदूर जैसे पदार्थों से बने लगते थे। पूरी रात मंदिर बंद रहता था, इसलिए इसे देवी की रात्रि परिक्रमा का चिह्न कहा जाता था। आज फर्श बदल जाने के बाद यह घटना नहीं दिखती, लेकिन इसके बारे में बुजुर्ग अब भी बताते हैं।
कंकालितला मंदिर में प्रसाद व्यवस्था
कंकालितला शक्तिपीठ में प्रसाद व्यवस्था बहुत सरल, स्थानीय और बंगाली परंपरा पर आधारित है। यहाँ किसी बड़े शक्तिपीठ जैसी भारी या संगठित प्रसाद व्यवस्था नहीं है, बल्कि लोक शैली में मिलने वाला प्रसाद प्रमुख है।
यहां पर मुख्य प्रसाद यानी कि भोग प्रसाद में सुबह और दोपहर के समय साधारण बंगाली शैली का भोग चढ़ाया जाता है जिसमें खिचुड़ी सब्जी, चना दाल और कभी कभी मीठा पायेश भी होता है यह वही भोग है जो पूजा के बाद श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में मिलता है। यहां पर मुख्य रूप से दिया जाने वाले सुखे प्रसाद में बताशा, नारियल के छोटे टुकड़े, मीठे पफ्ड राइस और त्योहारों में माल्पोआ शामिल है।
कंकालीतला एक तांत्रिक प्रधान स्थान होने के कारण कुछ विशेष अवसरों पर अलग तरह का प्रसाद चढ़ाया जाता है जिसमें लाल चावल, तिल मिश्रित प्रसाद, काले चने या कला भोग, काली प्रसाद मिठाई जैसी चीज़ें होती है। प्रसाद आपका गर्भगृह के बाहर छोटे काउंटर पर या फिर मंदिर के दाहिने तरफ बने नरमद शेड में भोग वितरण मिल जाएगा। यहां पर प्रसाद के लिए दान का फिक्स रेट कूपन नहीं है श्रद्धालु अपनी इच्छा अनुसार दान दे सकते हैं। भोग चढ़ाने के लिए पुजारी को निर्धारित न्यूनतम राशि बताई जा सकती है पर वह बहुत कम होती है।
कंकालितला मंदिर के त्यौहार (Kankalitala Mandir Festival)
कंकालितला शक्तिपीठ में मनाए जाने वाले त्योहार बंगाल की परंपरा, शक्त उपासना और तांत्रिक संस्कृति का मिश्रण हैं। यह मंदिर बहुत बड़ा नहीं है, इसलिए यहाँ के त्योहार साधारण लेकिन बेहद शक्ति प्रधान माने जाते हैं।
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दुर्गा पूजा
दुर्गा पूजा यहाँ का सबसे लोकप्रिय पर्व है। सप्तमी, अष्टमी, नवमी और दशमी पर विशेष भोग और पूजा होती है और नवमी की रात तांत्रिक अनुष्ठान भी होते हैं।
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काली पूजा
काली पूजा मां कंकाली की उपासना का सबसे उग्र पर्व है। रात में विशेष तांत्रिक पूजा, कपाल पूजन और बलिपरंपरा का प्रतीकात्मक रूप माना जाता है कुछ इसी वजह से उस समय भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।
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अमावस्या पूजा
कंकालितला तांत्रिक स्थल है, इसलिए हर अमावस्या विशेष मानी जाती है। इन दिनों के दौरान काली उपासना, विशेष भोग, रात में साधना सत्र जैसे कई सारे अनुष्ठान किए जाते हैं। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण अमावस्या माघ अमावस्या, आश्विन अमावस्या और कार्तिक अमावस्या है।
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पौष संक्रांति
पौष संक्रांति शीत ऋतु का बड़ा पर्व है। मंदिर और कोपाई नदी किनारे विशेष मेला लगता है। खिचुड़ी और पायेश का भोग माता को अर्पित किया जाता है और यह खासकर शांति पूजा का दिन माना जाता है।
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चैत्र नवरात्रि
गाँव के लोग चैत्र नवरात्रि को अधिक पारंपरिक रूप से मनाते हैं। उस समय छोटी दुर्गा पूजा की जाती है और भरपूर भोग अर्पित किया जाता है।
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आषाढ़ अमावस्या\गुप्त नवरात्रि
आषाढ़ अमावस्या जिसे गुप्त नवरात्रि भी कहते हैं उसके दौरान यहाँ का सबसे गुप्त और तांत्रिक महत्त्व वाला पर्व शुरू होता है। रात्रि में विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। हर जगह से तांत्रिकों का आगमन होता है और यह बहुत कम प्रचारित वाला त्यौहार है।
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स्थानीय ‘कंकाल मेला’
कुछ वर्षों में विशेष दिनों पर नदी तट पर स्थानीय मेला आयोजित होता है। इसमें लोक कीर्तन, साधारण पूजा, ग्रामीण भोग वितरण जैसी चीजें भी शामिल हैं।
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श्याम रात्रि\काली रात्रि साधना
श्याम रात्रि या फिर काली रात्रि साधना कोई आधिकारिक सार्वजनिक त्योहार नहीं है लेकिन कई साधक इसे एक आध्यात्मिक पर्व मानते हैं।
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शिवरात्रि
क्योंकि परिसर में एक छोटा शिव स्थान भी है, इसलिए शिवरात्रि पर पूजा, भोग और रातभर जप किया जाता है।
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बासंती पूजा
बासंती पूजा कुछ सालों में स्थानीय समुदाय द्वारा आयोजित की जाने वाली पूजा है। यह पूजा 3-4 दिन की पूजा होती है जो हल्की, शांत और ग्रामीण शैली की झलक देती है।
कंकालितला मंदिर के नियम
1. गर्भगृह में जूते चप्पल बिल्कुल न ले जाएँ। अधिक भीड़ में गर्भगृह के अंदर अधिक समय रुकने की अनुमति नहीं है। देवी की पिंडी (मूर्ति) को छूने की अनुमति नहीं है, केवल दूर से प्रणाम किया जा सकता है।
2. कंकालितला में श्मशान तट की दिशा में एक छोटा तांत्रिक क्षेत्र है। इसके नियम कुछ इस प्रकार है कि रात के समय आम लोगों का प्रवेश सीमित है। तांत्रिक अनुष्ठान के समय व्यवधान वर्जित है। फोटो या वीडियो करना सख्त मना है। अनधिकृत तांत्रिक क्रियाएँ करना पूर्णतः वर्जित है।
3. मंदिर के पीछे कोपाई नदी पूजा पद्धति का हिस्सा मानी जाती है। यहाँ कचरा, प्लास्टिक या प्रसाद के पैकेट नदी में न फेंकें। तांत्रिक रात्रि पर्वों में नदी तट पर घूमना वर्जित है। नदी में नहाना केवल सुबह के समय ही अनुमति है।
4. भोग चढ़ाने से पहले पुजारी से अनुमति लें। प्रसाद के लिए लाइन में अनुशासन रखें। त्यौहारों में सूखा प्रसाद ही दिया जाता है, इस पर विवाद न करें। मंदिर में पकाया हुआ भोजन बाहर नहीं ले जाते क्योंकि यह स्थानीय परंपरा है।
5. गर्भगृह के अंदर फोटो पूरी तरह प्रतिबंधित। तांत्रिक अनुष्ठान के दौरान फोटो/वीडियो लेना बिल्कुल मना है। नदी तट या मंदिर परिसर की सामान्य तस्वीरें अनुमत हैं, पर भीड़ में सावधानी रखें।
6. पूजा हमेशा पुजारी की देखरेख में करें। कच्चा नारियल, फूल, लाल चूनरी चढ़ाना सामान्य है, लेकिन मांस/शराब चढ़ाना वर्जित है। तांत्रिक अनुष्ठानों में केवल प्रशिक्षित साधकों को अनुमति।
7. कंकालितला गाँव में स्थित है, इसलिए परिसर बहुत साफ रखा जाता है तो कृपया कचरा न फैलाएँ। धूप अगरबत्ती निर्धारित स्थान पर ही जलाएँ। अनधिकृत भंडारा/भोग वितरण की अनुमति नहीं है।
8. दर्शन सुबह और शाम के निर्धारित समय में ही करें। अमावस्या या तांत्रिक रात्रि में रात देर तक रुकना अनुमति अनुसार ही करे।
9. मंदिर परिसर, तांत्रिक क्षेत्र, नदी-तट तीनों में शराब, गुटखा, धूम्रपान पूरी तरह वर्जित है।
10. लाइन में धक्का मुक्की बिल्कुल न करे, बुजुर्गों और महिलाओं को प्राथमिकता दें और साथ ही में पुजारियों और स्थानीय प्रबंधकों के निर्देशों का पालन अनिवार्य है।
कंकालितला मंदिर में पूजा विधि
कंकालितला शक्तिपीठ में की जाने वाली पूजा बंगाल की शक्त-परंपरा, काली उपासना और तांत्रिक साधना, इन तीनों का मिश्रण है। यहाँ की पूजा सरल होते हुए भी गहरी आध्यात्मिक और उग्र शक्ति से जुड़ी मानी जाती है।
[प्रातःकालीन अनुष्ठान सुबह 5:00–7:00 बजे]
- मंगल आरती
सुबह सबसे पहले मंगल आरती की जाती है। इसमें शंख, घंटी, ढाक की ध्वनि और देवी कंकालेश्वरी की स्तुति की जाती है।
- अभिषेक\स्नान पूजा
माता की मूर्ति का जल, दूध, दूर्वा, गंगाजल आदि से अभिषेक किया जाता है। इसके बाद लाल चूंड़ी, सिंदूर और हल्दी का श्रृंगार होता है।
- अलंकरण पूजा
देवी को लाल वस्त्र, पुष्पमाला, धूप, दीया, कर्पूर अर्पित किया जाता है। भक्त भी इस समय सिंदूर और चून पत्र अर्पित करते हैं।
[मध्याह्न दोपहर 12:00–1:00 बजे]
- मध्याह्न आरती
मध्याह्न आरती दोपहर का प्रमुख अनुष्ठान है। मंदिर-परंपरा के अनुसार कुछ दिनों में विशेष भोग भी लगाया जाता है। जिसमें खिचड़ी, मीठा भोग, फल, नारीयल आदि शामिल है।
- भोग नैवेद्य
स्थानीय परंपरा में कभी कभार बलि चिह्न (नारियल-फोड़) की प्रतीकात्मक प्रथा भी निभाई जाती है।
[संध्या-वंदन शाम 6:00–7:30 बजे]
- संध्या आरती
संध्या आरती सूर्यास्त के समय की होने वाली महत्वपूर्ण पूजा है। इसमें देवी को दीप, अगरबत्ती, धूप, नैवेद्य अर्पण किया जाता है।
- शाम का भोग
इस समय के दौरान साधारणतया मिठाई, फल, और गुड़ भोग चढ़ाया जाता है।
[रात्रि पुजन रात 8:00–9:00 बजे]
- शयन पूजा
देवी को दिन की अंतिम आरती के साथ विश्राम पूजा की जाती है।कर्पूर आरती और छोटे दीपों के साथ अंतिम भोग अर्पित किया जाता है।
[विशेष रूप से प्रसिद्ध विशेष अनुष्ठान]
- अमावस्या पूजा
कंकालितला को तांत्रिक परंपरा का केंद्र माना जाता है, इस दिन विशेष तांत्रिक पूजा अनुष्ठान किए जाते हैं जिसमें कालिका पूजा, भैरव पूजा, रात्रि दीपदान, मंत्र साधना की जाती है।
- दुर्गा पूजा\ नवरात्रि
9 दिनों तक विशेष चंडी पाठ, कुंकुम अर्चना, अर्घ्य, दीपदान किया जाता है।
- शिव रात्रि
चूँकि यह स्थान शिव शक्ति-मिलन स्थान माना जाता है, इस दिन भैरव पूजा, रात्रि-जागरण और जल अभिषेक किया जाता है।
- सावन सोमवार
सुबह शाम शिव अभिषेक और देवी अर्चना विशेष रूप से होती है।
कंकालितला मंदिर के आसपास और कौन सी अच्छी जगह घूम सकते हैं?
1) शांतिनिकेतन
दूरी: 4-5 km
रबीन्द्रनाथ टैगोर की विश्व भारती विश्वविद्यालय, आश्रम परिसर, कला भवन, संग्रहालय, उपासनागृह है। यहाँ का वातावरण बेहद शांत और सांस्कृतिक है।
2) सोनाजुरी हाट
दूरी: 5-6 km
यहां पर हस्तशिल्प, बाउल संगीत, लोक-नृत्य, मिट्टी की कला सब लाइव देखने को मिलता है। यह जगह उसके लिए सबसे लोकप्रिय है।
3) बाउल संगीत ग्राम
दूरी: 6-7 km
यह बंगाल के बाउल गायकों का गाँव है। यहाँ लाइव बाउल फोक संगीत सुनने को मिलता है।
4) देउल
दूरी: 25-30 km
यह पुराने और दुर्लभ टेराकोटा मंदिरों का क्षेत्र है साथ ही में प्रकृति और इतिहास का अनोखा मिश्रण है।
5) कुप
दूरी: 3-4 km
यह लाल मृदा की घाटियाँ है। टैगोर ने कई कविताएँ इसी पर लिखीं थीं। साथ ही में यह फोटो लेने के लिए खूबसूरत जगह है।
6) बॉलपुर हाट/हस्तशिल्प बाजार
दूरी: 7 km
यह कला, कपड़े, शिल्प, सनातन बंगाली हस्तशिल्प की बहुत अच्छी जगह है।
7) अमरकुटी आश्रम
दूरी: 9-10 km
यह एक शांत आश्रम, योग, आयुर्वेद, गौशाला ओर प्राकृतिक वातावरण से भरी जगह है।
8) नंदन कला भवन
दूरी: 5 km
यह जगह रवीन्द्रनाथ टैगोर और नंदलाल बोस के कला कार्य देखने के लिए प्रसिद्ध है।
9) शिल्प ग्राम
दूरी: 6 km
भारत के अलग अलग राज्यों की सांस्कृतिक झलक और शिल्प कुटीरें यहां पर आपको देखने को मिलेंगी।
10) स्रीनिकेतन
दूरी: 8-10 km
यह हस्तनिर्मित कपड़े, ढाक, बाटिक, हस्तकला वस्तुएँ खरीदने की बेहतरीन जगह है।
कंकालितला मंदिर जाने का बेहतरीन समय
मंदिर जाने के लिए कोई भी समय योग्य है किंतु मौसम के अनुसार अगर आप जाने का विचार कर रहे हैं तो अक्टूबर से फरवरी का मौसम सबसे बेहतरीन रहेगा क्योंकि इस समय मौसम सुहाना होता है और साथ ही में भीड़ मध्यम रहती है। इसके अलावा आप किसी भी त्यौहार के दौरान मंदिर में जा सकते हैं।
कंकालितला मंदिर जाने की सुविधा
आप भारत की किसी भी कोने से ट्रेन सेवा का उपयोग करके कोलकाता जा सकते हैं और वहां से टैक्सी बस या फिर रिक्शा करके मंदिर में दर्शन कर सकते हैं साथ ही में आप कुछ इसी प्रकार हवाई मार्ग भी ले सकते हैं।
कंकालितला मंदिर रहने और खाने की सुविधा
मंदिर के आसपास रहने और खाने के लिए कई सारी धर्मशाला और होटल है आप अपनी व्यवस्था के अनुसार वहां पर रह सकते हैं।
कंकालितला मंदिर के कुछ रोचक तथ्य
कंकालितला शक्तिपीठ को वह स्थान माना जाता है जहाँ देवी सती के शरीर का अस्थि अथवा कंकाल भाग गिरा था, इसलिए इसका नाम “कंकाल तला प्रचलित हुआ और इसे तांत्रिक परंपराओं में विशेष शक्ति-स्थान माना जाता है।
प्राचीन समय में यह पूरा क्षेत्र एक महाश्मशान था, जहाँ तांत्रिकों और अघोरियों की साधना अत्यंत सक्रिय रहती थी, और माना जाता था कि यहाँ मंत्र सिद्धि जल्दी प्राप्त होती है। नदिया नदी को पुराने समय में “कुरुती” कहा जाता था, क्योंकि बरसात में इसका पानी लालिमा लिए दिखाई देता था, और इसी नदी के उफान से मंदिर कई बार बह भी चुका है, फिर भी शक्ति-स्थान कभी बदला नहीं गया।
नदी किनारे एक रहस्यमय “काली द्वार” की लोककथा भी मिलती है, जहाँ रात के समय साधकों को काली की ध्वनियाँ सुनाई देती थीं। यहाँ की सबसे अनोखी बात यह थी कि पूजा में मंत्र फुसफुसाकर बोले जाते थे, क्योंकि मान्यता थी कि देवी धीमे मंत्र ही स्वीकार करती हैं।
देवी की मूर्ति सामान्य रूप की न होकर कंकाल तांत्रिक स्वरूप मानी जाती है, और पुराने तांत्रिक “कंकाल दर्शन साधना” में अस्थियों का प्रतीक रखते थे। कंकालितला का संबंध रवीन्द्रनाथ टैगोर से भी जुड़ता है, जो यहाँ की नदी तट की आध्यात्मिक ऊर्जा से प्रभावित होकर अक्सर ध्यान और लेखन के लिए आते थे।
ध्यान देना: कंकालीतला मंदिर के लिए कोई एक ऑफिशियल वेबसाइट नहीं है; हालाँकि, आप बीरभूम क्षेत्र के लिए ऑफिशियल डिस्ट्रिक्ट वेबसाइट birbhum.gov.in पर जानकारी पा सकते हैं।