हनुमान न्यूज़ में आपका स्वागत है। यहां पर आपको इस मंदिर का पूर्ण इतिहास, इसमें किए जाने वाली पूजा, त्योहार, कुछ अनसुनी बातें, मंदिर के आसपास घूमने की अच्छी जगह, रहने और खाने की व्यवस्था, जैसी कई सारी चीजों के बारे में जानकारी मिलेगी।
कालीघाट काली शक्तिपीठ मंदिर के बारे में जानकारी
हजारों सालों से काला जादू अखंड भारत का हिस्सा रहा है और काला जादू करने के लिए हर गांव हर शहर में कोई ना कोई होता है किंतु जैसे हर देश की एक राजधानी होती है कुछ इसी प्रकार काला जादू करने वाले लोगों की राजधानी कोलकाता को कह सकते हैं। क्योंकि उसे शहर में हजारों की तादाद में तांत्रिक रहते हैं और तांत्रिक विद्या करते हैं।
भारतीय हिंदू तांत्रिक परंपरा यह इतनी बड़ी है कि आप जितना उसके बारे में जानने की कोशिश करेंगे वह उतना ही बढ़ता जाएगा और साथ ही खतरनाक भी। तांत्रिक परंपरा में 10 महाविद्याओं का उल्लेख है और उसमें काली पूजा परंपरा में सर्वोच्च स्थान पर आती है। तांत्रिकों की देवी मां काली को माना जाता है और काली माता के मंदिर के अनुसार 51 शक्तिपीठ में से एक शक्तिपीठ है कालीघाट काली शक्तिपीठ जो कोलकाता में स्थित है।
देवी भागवत पुराण कालिका पुराण और शक्तिपीठ स्त्रोतों के अनुसार जब माता सती के शरीर को भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र द्वारा विभाजित किया गया था उसे समय माता की दाहिने पैर की उंगलियां यहां पर गिरी थी। यह स्थल पूर्वी भारत के सबसे पुराने और सबसे महत्वपूर्ण पूजा स्थलों में से एक है और साथ ही कर आदि शक्तिपीठों में से एक होने के नाते मंदिर पूरे वर्ष लाखों भक्तों को आकर्षित करता है खासकर काली पूजा नव वर्ष पोइला बैसाख, स्नान यात्रा, दुर्गा पूजा और कई अमावस्या जैसे अवसरों पर।
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कालीघाट काली शक्तिपीठ मंदिर का पूर्ण इतिहास (History Of Kali Ghat Mandir)
कालीघाट को कालीघाट इसलिए कहा जाता है क्योंकि एक तरफ माता का मंदिर है और दूसरी तरफ गंगा का घाट इसी वजह से इस स्थल को कालीघाट कहा जाता है। यहां पर मां काली की पूजा की शुरुआत पांचवी एवं दसवीं शताब्दी के दौरान हुई थी तब यह स्थल जंगल और गंगा किनारे का था। सबसे आरंभिक रूप में यह मंदिर किसी एक राजा द्वारा नहीं बल्कि आदिवासी या फिर कुछ साधु और तांत्रिकों द्वारा स्थापित माना जाता है। वह लोग मां काली की पूजा अपनी विधियों मैं करते थे। ऐसा मानते हैं कि इस स्थान पर एक छोटा सा देवी स्थान था जहां पर लकड़ी या तो फिर मिट्टी की मूर्ति थी।
उसे समय के बेहद बड़े और महान तांत्रिकों के रूप में एक नाम सबसे उभर कर आता है जो है “कृष्णानंद आंगरिया”। माना जाता है की पहली बार इस मंदिर को संरचना के रूप में उन्हीं ने बनाया था इसके ऊपर विद्या विनोद ग में उल्लेख मिलता है कि “कृष्णानंद ने कालीघाट में देवी की मूर्ति स्थापना और पूजा परंपरा को स्थिर किया”लेकिन मंदिर का यह स्वरूप छोटा और तांत्रिक परंपरा वाला था।
स्थानिक लोगों के लिए बड़ा मंदिर बनाने की सबसे पहले शुरुआत 17वीं और 18वीं शताब्दी के बीच में हुई। कालीघाट मंदिर को वास्तविक मंदिर के स्वरूप में पहली बार साबरनारॉय चौधरी परिवार द्वारा बनाया गया। यह परिवार बंगाल के प्रसिद्ध जमींदार परिवारों में से एक था जिन्हें नवाबों द्वारा मान्यता प्राप्त हुई थी और भूमि प्रशासन में यह प्रमुख स्थान रखते थे।
इन्होंने ही मंदिर के लिए जमींदार में दी थी और स्थानीय पूजा व्यवस्था को स्थापित किया था जिसकी वजह से मंदिर की संरचना मजबूत हुई। आज का मुख्य कालीघाट मंदिर 1809 से 1814 के बीच में पुनः निर्माण करवाया गया था। इस निर्माण में सबसे बड़ी भूमिका थी साबरना परिवार और कुछ कोलकाता के धनी दानवीर व्यापारियों की जिन्हें कालीघाट मंदिर के सेवायत और महंत माना जाता है।
इस मंदिर को कली कुंड शक्तिपीठ और पादाङ्गुली पीठ भी कहा जाता है।
इस मंदिर को कली कुंड शक्तिपीठ इसीलिए कहा जाता है क्योंकि प्राचीन तांत्रिक ग में यह लिखा है कि कालीघाट का मूल स्थान एक गहरा जल कुंड था जहां पर तांत्रिक साधना पशु जप काली साधना गुप्त अनुष्ठान ज्ञान जैसी कई सारी क्रियाएं की जाती थी। यह आदि गंगा यानी की पुरानी गंगा धारा का जल, गोलाकार कुंड बनता था इस कुंड को देवी का शक्ति प्रवाह माना जाता था। कली कुंड यानी कि एक ऐसा स्थल जहां पर काली मां का दिव्या ऊर्जा केंद्र है। यह नाम लोक परंपरा एवं तंत्र शास्त्र दोनों में मिलता है।
कालीघाट को पादाङ्गुली पीठ शक्तिपीठ भी कहा जाता है क्योंकि इस जगह पर माता के पैरों की उंगलियां गिरी थी। पादांगुली शक्तिपीठ यानी कि एक ऐसा स्थल जहां पर सती मां के पैरों की उंगलियां गिरी थी।
यहां और एक बेहद महत्वपूर्ण बात है कि प्रत्येक शक्तिपीठ में एक भैरव नियुक्त होते हैं जैसे कि इस जगह पर नकुलेश्वर महादेव देवी का भैरव स्वरूप है। जो देवी की रक्षक शक्ति है, स्थान का दिगपाल है, तांत्रिक ऊर्जा का नियंत्रक है, साधना का स्थिर स्तंभ है, मंडल का पुरुष तत्व है। नकुलेश्वर महादेव का अर्थ है नकुल यानी कि शिव का एक प्राचीन तांत्रिक रूप जिसे कभी-कभी नाग या फिर नेवले का देवी प्रतीक माना जाता है और ईश्वर यानी कि प्रभु।
नकुलेश्वर शिव का वह स्वरूप है जो काली की तांत्रिक ऊर्जा को संतुलित रखता है स्थान की रक्षा करता है साधना में अवरोधों को दूर करता है देवी की उग्र शक्ति को सह अस्तित्व देता है यह रूप तंत्र चूद़ामणि और कालीका पुराण में भी उल्लेखित है।
काली और भैरव का संबंध आवश्यक है क्योंकि देवी यानी की शक्ति ऊर्जा का स्वरूप है उसी के सामने भैरव शिव स्थिरता और नियंत्रण का स्वरूप है काली की उग्र शक्ति को स्थिरता और दिशा देने का काम भैरव का होता है।
इसीलिए कालीघाट में कहा जाता है कि “काली के बिना नकुलेश्वर पूर्ण नहीं, और नकुलेश्वर बिना काली प्रकाश नहीं।”
कालीघाट शक्ति पीठ और तंत्र साधना
कालीघाट को भारत का सबसे प्राचीन सक्रिय और जीवित तांत्रिक केंद्र माना जाता है यह शमशान तंत्र, काली तंत्र और महाविद्या प्रवाह का संगम है। उनकी तीन विशेष शक्तियां है जिसमें से सर्वप्रथम है आदि गंगा, कली कुंड और अग्नि का त्रिकोण। उसके बाद काली का जिह्वा रूप जिसमें रक्त ऊर्जा का प्रतीक छिपा है और तीसरा है नकुलेश्वर भैरव।
कालीघाट और 10 महाविद्याओं का संबंध
तंत्र के अनुसार 10 महाविद्याएं किसी एक स्थान पर पूर्ण रूप से उपस्थित नहीं हो सकती लेकिन कालीघाट उन कुछ स्थानों में से है जहां सभी महाविद्या एवं ऊर्जाओं का आंशिक रूप मिलता है उन एक-एक विधाओं का कालीघाट से संबंध कुछ इस प्रकार है।
(1) काली (मुख्य अधिष्ठात्री)
कालीघाट का मूल तांत्रिक केंद्र दक्षिण कालिका स्थान है।यह रूप ब्रह्मांड की समय ऊर्जा और विनाश रक्षा का संगम है। कालीघाट में कई सारे प्रतीक है जैसे की मां का प्रसन्न परंतु उग्र रूप, श्मशान संबंधित ऊर्जा और लम्बी जिह्वा।
(2) तारा
तारा और काली दोनों श्मशान तंत्र की नायिकाएं हैं कालीघाट की ऊर्जा में तारा की रक्षा शक्ति सक्रिय मानी जाती है। कालीघाट में उनके प्रतीक कली कुंड के जल का नील तांत्रिक अर्थ और मंत्र रक्षा की परंपरा से जुड़ा है।
(3) छिन्नमस्ता
इन्हें रक्त ऊर्जा और आत्म बल की देवी कहा जाता है। कालीघाट की जिह्वा में इस महाविद्या का प्रभाव माना जाता है। उनके प्रतीक स्वरूप देवी की जी हां का लाल विस्तृत स्वरूप और बिंदी के आसपास लाल आकृति।
(4) भुवनेश्वरी
कालीघाट को आध्यात्मिक “जाग्रत” स्थान भुवनेश्वरी की कृपा से माना जाता है।प्रतीक के स्वरूप मंदिर का शक्तियुक्त मंडल और पूजा स्थल में “लाल त्रिभुज” का चिह्नबिंदी के आसपास लाल आकृति है।
(5) भैरवी
कालीघाट का भैरवी संबंध बहुत गहरा है। यहाँ तंत्र प्रवाह में “त्रिकाल भैरवी” की उपस्थिति कही जाती है। प्रतीक स्वरूप यहां पर शाम के समय की ऊर्जा घनत्व ओर शक्ति की तीव्रता है।
(6) धूमावती
यह महाविद्या अशुभ को दूर करने वाली और त्याग की महाविद्या है और कालीघाट के स्मशान संबंधित तत्त्व में धूमावती का प्रभाव है। प्रतीक स्वरूप कालीकुंड में कभी धुआँ उठने की लोक कथा और वायवी शक्तियाँ है।
(7) बगलामुखी
इन्हें विरोधी शक्तियों को रोकने वाली देवी। कालीघाट के चारों ओर सुरक्षा-वृत्त इस महाविद्या का प्रभाव माने जाते हैं। प्रतीक स्वरूप मंत्र रक्षा और मंदिर के चारों ओर विशेष दिशा स्थितियाँ है।
(8) मातंगी
इन्हें संगीत, तंत्र-मंत्र, और वाणी की महाविद्या कहा जाता है। साथ ही कालीघाट के भोग, नृत्य-ध्वनि, और आरती में मातंगी की उपस्थिति मानी जाती है।
(9) कमला
यह धनलक्ष्मी का तांत्रिक रूप है। इन्हें कालीघाट में लोक स्तर पर कमला की कृपा से “सौभाग्य ऊर्जा” मानी जाती है।
(10) त्रिपुरासुन्दरी
यह श्रीविद्या, सौंदर्य और चैतन्य शक्ति की अधिष्ठात्री हैं कालीघाट की देवी के मुख विन्यास और सौम्य सौंदर्य में इस महाविद्या का अंश है।
कालीघाट काली शक्तिपीठ मंदिर से जुड़ी लोककथाएं
कालीघाट (Kali Ghat Kolkata) की तीन रहस्यमयी लोक कथाएँ है।
उसमें से सर्वप्रथम लोक कथा कुछ ऐसी है कि काली की जिह्वा रात में गायब हो जाती थी और यह बहुत प्राचीन लोक विश्वास है। आज के समय कालीघाट की मूर्ति की लंबी जिह्वा धातु की है,लेकिन पुरानी मूर्ति की जिह्वा रात में छोटी और सुबह बड़ी दिखाई देती थी।
- पुरोहितों का कथन अनुसार, “रात में काली मायावी रूप में निकलती है, और तांत्रिकों की साधना की रक्षा करती है।”यह घटना 17वीं–18वीं शताब्दी में यात्रियों द्वारा वर्णित है।
कालीघाट का कुंड जहाँ तांत्रिकों ने शव-साधना का रहस्य छिपाया गया था। माना जाता है कि यहां आदि गंगा तट पर एक गहरा कुंड था।
- कहते हैं कि, “कालीघाट की देवी रात्रि में इस कुंड से उठती है, और इसके जल में काली की मायावी शक्ति बसती है।” तांत्रिक मानते थे कि कुंड कभी सूखता नहीं, कुंड में दीए अपने आप जलते और कुंड के पास जाने पर ऊर्जा कंपित होती है। यह कुंड आज अस्तित्व में नहीं है, परन्तु इसकी कथा जीवित है।
एक घटना क्लोज यू वर्णित है कि नकुलेश्वर महादेव की मूर्ति अपने आप हिलती थी। >नकुलेश्वर महादेव, जो इस शक्तिपीठ के भैरव हैं, उनकी मूर्ति के बारे में कहा जाता है कि, “जब कोई बड़ा तांत्रिक सिद्धि प्राप्त करता था, तो नकुलेश्वर महादेव की मूर्ति हल्का कंपन करती थी।” यह दावा 19वीं शताब्दी के कई शैव पंडों ने किया है।
मान्यता यह भी है कि:
- नकुलेश्वर स्वयं काली के मंत्रों की रक्षा करते हैं।
- साधना विफल होने पर भैरव क्रोधित रूप दिखाते हैं।}
कालीघाट काली शक्तिपीठ मंदिर की वास्तुकला
भारत के हर पौराणिक मंदिर में अपनी एक अलग वास्तुकला होती है और उसे वास्तु कला की वजह से मंदिर की पहचान बनती है। कुछ इसी प्रकार से कालीघाट काली शक्तिपीठ में भी एक अलग वास्तुकला है। यह मंदिर बंगाल की ढाक छाला शैली में बना है। माना जाता है कि यह शैली बंगाल के मिट्टी घरों और नाटक मंडपों से प्रेरित है। बंगाल में ग्रामीण घरों की छतें घुमावदार होती थीं और इन्हीं घरों की शैली बाद में मंदिरों में विकसित हुई। कालीघाट मंदिर इसी धा छाला संरचना पर आधारित है।
धा छाला संरचना यानी की “दो-छाला” संरचनाएँ एक दूसरे पर चढ़ी होती हैं। छतों में “बाँस की झोपड़ी” जैसा घुमाव होता है, ऊपरी ढलानें तेज़ और निचली ढलानें चौड़ी होती हैं।इसका उद्देश्य यूं है कि बारिश के पानी का तेज़ निकास हो सके, तापमान में संतुलन बना रहे, मंदिर के अंदर शांति और ध्वनि का प्राकृतिक प्रतिध्वनि रहै।
कालीघाट काली शक्तिपीठ मंदिर के मुख्य वस्तु भाग कुछ इस प्रकार है:
[1] गर्भगृह:
यह वह स्थान है जहां काली माता का माल प्रत्यक्ष रूप स्थापित है। यह प्रतिमा अत्यंत अनोखी है क्योंकि इसकी लंबी जीभ, तीन बड़ी सोने की आंखें, वस्त्रौ से अलंकृत काली रंग की कास्ट मूर्ति! इसे कालीघाट काली का खास रूप और कहा जाता है।
[2] नाटमंडिर:
कालीघाट शक्तिपीठ का नाटमंडिर (या “नाट मंडप”) मंदिर के मुख्य गर्भगृह के ठीक सामने स्थित एक बड़ा, खुला, धार्मिक सभा मंडप है, जहाँ सदियों से पूजा, नृत्य, भजन, और विशेष अनुष्ठान होते आए हैं। इसे कालीघाट मंदिर परिसर की आध्यात्मिक धड़कन माना जाता है।
नाटमंडिर का उल्लेख 17वीं–18वीं सदी की बंगाली परंपराओं में भी मिलता है। नाटमंडिर का आध्यात्मिक अर्थ कुछ इस प्रकार है की देवी की ऊर्जा के सामने नृत्य योग करना। देवी काली को नृत्य की अधिष्ठात्री भी कहा जाता है। नाटक, नृत्य और भजन यहां देवी के सामने अर्पण माने जाते हैं।
ऐसा भी माना जाता है कि मानव और देवी के बीच यह ऊर्जा का पुल है यानी कि यह गर्भ गुरु और भक्तों के बीच एक आध्यात्मिक माध्यम बनता है। यह लोक संस्कृति और शक्ति उपासना का संगम भी है वह इसीलिए क्योंकि बंगाल की संस्कृति, संगीत, कला और शक्ति उपासना सब यहां साथ मिश्रित होता है।
[3] कुंडा क्षेत्र या हैवान स्थल:
इस स्थान पर तांत्रिक पूजा हवन और विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं।
[4] नकुलेश्वर भैरव मंदिर:
शक्तिपीठ में भैरव की पूजा अनिवार्य है क्योंकि नकुलेश्वर काली मां के रक्षक स्वरूप है। यह प्राचीन बंगाल के चार चला ढांचे का उदाहरण है जिसमें छोटा वर्गाकार गर्भगृह होता है साथ ही ऊपर छोटी छत और ढलान, लाल और काले रंग का प्रयोग और अंदर शिवलिंग ग्रेस्टोन से बना है।
[5] शिखर और छत:
कालीघाट मंदिर का शिखर उत्तरी भारत के नागर, द्रविड़ या कलिंग शैली जैसा नहीं है। यह पूरी तरह बंगीय छाला शैली से प्रेरित है। छत की विशेषताएँ कुछ इस प्रकार है, मंदिर में दोहरी छत व्यवस्था है, ऊपर की छत नीची और तीखी ढलान वाली है, नीचे की छत चौड़ी और लंबी है, बारिश को तेजी से गिराने वाला ढलाव हैं और किनारों पर तरंगों सी आकृति बनी है।
[6] परिक्रमा पत्र और खुला प्रांगण:
मंदिर परिसर में परिक्रमा पद खुला रखा गया है ताकि हवा का प्रवाह बना रहे, भक्त मंद गति से परिक्रमा कर सके और विशेष पर्वों पर भीड़ नियंत्रित रहे। प्रांगण के चारों ओर पुराने समय की अत छाला शैली के छोटे कमरे बनाए गए हैं जिसमें सेवा नीलवास और भोग निर्माण स्थल भी शामिल है।
[7] सजावट:
कालीघाट मंदिर में अत्यधिक शिल्प नक्काशी नहीं है क्योंकि यह बंगाल की सरल ग्रामीण शैली को जीवित रखना है। फिर भी कुछ विशेषताएं हैं जैसे की दीवार पर हल्की चुना लेप नक्काशी, लाल सफेद और पीले रंग का उपयोग, बंगाल के पारंपरिक रंग का निर्देश करता है। स्तंभों पर कमल की आकृति और छत पर हल्की तरंगे जैसी चीज शामिल है।
[8] नदी आधारित वास्तुकला:
पहले मंदिर बिल्कुल आदि गंगा किनारे था इसी वजह से मंदिर मधुमक्खी के छत्तै जैसे घुमावदार होते हैं ताकि नमी और बारिश का असर कम हो इसी प्रकार कालीघाट मंदिर भी इसी सिद्धांत पर बनाया गया है।
[9] आधुनिक और प्राचीन मिश्रित संरचना:
पुराना गर्भगृह और छाला शैली आज भी वैसी ही है, परंतु स्तंभ नाटमंदिर का ऊपरी हिस्सा, फर्श, भीड़ नियंत्रण के मार्ग जैसी चीजे धीरे-धीरे आधुनिक बनाए गए हैं।
कालीघाट काली शक्तिपीठ मंदिर में प्रसाद व्यवस्था
मूल रूप से माता को बंगाल की परंपरा के अनुसार भोग चढ़ाया जाता है प्रमुख भोग में खिचुड़ी, भोग खिचुरी सब्ज़ी,लाबड़ा (मिक्स वेज),भोग वाला पायेश(खीर),चना और गुड़, नारियल, फल, मिठाई (रसगुल्ला/संदेश) सुबह के भोग में फल, मिठाई, मेवा, काला चना, गुड़ जेसी चीजें शामिल है। शाम के भोग में हल्का भोजन, पायेश, फल जेसी चीजें शामिल है।
•भोग अर्पित होने के बाद उसे “प्रसाद” कहा जाता है। भक्तों को ये प्रसाद मिलता है सामान्य प्रसाद जैसे कि नारियल, चूरा बताशा,फूल और सिंदूर, चिन्हित कुमकुम, छोटा पैकेट प्रसाद
विशेष दिन का प्रसाद में पायेश, खिचुड़ी, मिठाई कद्दू का “भोग सब्ज़ी” जेसी चीजें शामिल है।
प्रसाद कहाँ से मिलता है?
कालीघाट में प्रसाद प्राप्त करने के दो मुख्य तरीके हैं: मंदिर के अंदर सेवायत द्वारा दिया जाने वाला प्रसाद कभी-कभी गर्भगृह के बाहर लाइन में थोड़ा सा फूल सिंदूर और बताशा दिया जाता है। मंदिर के बाहर आधिकारिक दुकानों से प्रसाद मील सकता है। मंदिर परिसर के चारों ओर कई दुकानों में: नारियल, गुड़, बताशा,फल, लाल चुनरी, सिंदूर, गंगाजल, मिलता है, जिसे भक्त “चढ़ावा” के रूप में अंदर चढ़ाते हैं।
विशेष पर्व में पसाद:
- नवरात्रि और काली पूजा में: बड़ी मात्रा में भोग खिचड़ी, लाबड़ा सब्ज़ी, पायेश, मिठाई, हज़ारों भक्तों में बाँटी जाती है।
- अमावस्या पर: नारियल और चूरा प्रसाद, काले चने, गुड़, फूल-सिंदूर
- मंगलवार/शनिवार: यहाँ काली माँ के विशेष दिन माने जाते हैं, इसलिए प्रसाद की मांग अधिक होती है।
“बलि” परंपरा और प्रसाद (ऐतिहासिक तथ्य) पुराने समय में:
कालीघाट में बलि (अधिकतर बकरी) दी जाती थी। उसका प्रसाद श्रद्धालुओं में बाँटा जाता था। लेकिन कई वर्षों से यह प्रथा लगभग पूरी तरह बंद हो चुकी है। अब केवल कद्दू और नारियल का प्रतीकात्मक कटाव होता है।
प्रसाद का आध्यात्मिक महत्व:
कालीघाट में प्रसाद को विशेष माना जाता है क्योंकि यह शक्तिपीठ है। भोग पंचतत्व से बनता है, मा काली के नाम पर पका भोजन “ऊर्जायुक्त” माना जाता है कई लोग इसे सुरक्षात्मक प्रसाद कहते हैं (सिंदूर और फूल विशेष रूप से) कई लोग ऐसा मानते हैं कि वहां मांसाहारी प्रसाद मीलता है लेकिन यह बात की पुष्टि आप वहां स्वयंम जाकर कर सकते हैं।
कालीघाट काली शक्तिपीठ आरती का और दर्शन का समय
- सुबह की आरती: मंगला आरती
सुबह 5:00 AM
मंदिर खुलते ही होती है
- दोपहर की आरती (भोग आरती)
लगभग 12:00 PM – 12:30 PM
- शाम की आरती (संध्या आरती)
शाम 6:30 PM – 7:00 PM
- रात की आरती (शयन आरती)
रात 10:00 PM
इसके बाद मंदिर बंद होने की तैयारी होती है।
1. मंदिर खुलने का समय:
सुबह 5:00 बजे
इस समय मंगल आरती होती है और पूजा शुरू होती है।
2. सुबह का दर्शन समय:
5:00 AM – 2:00 PM
इस दौरान भक्त गर्भगृह में जाकर दर्शन कर सकते हैं।
11:30 AM – 12:30 PM के बीच भोग के कारण भीड़ थोड़ी धीमी होती है, लेकिन मंदिर बंद नहीं होता।
3. भोग और नैयवेद्य समय:
11:30 AM – 12:30 PM
(इस समय देवी को भोग अर्पित होता है)
4. शाम को मंदिर खुलने का समय:
शाम 5:00 बजे
भोग के बाद मंदिर थोड़े समय के लिए अंदरूनी सेवाओं हेतु बंद रहता है और 5 बजे पुनः खुलता है।
5. शाम का दर्शन समय:
5:00 PM – 10:30 PM
दर्शन रात 10:30 बजे तक मिलता है।
कुछ विशेष दिनों में भीड़ अधिक होने पर यह समय बढ़ भी सकता है।
कालीघाट काली शक्तिपीठ मंदिर के नीति नियम (Kali Ghat Kali Mandir Rule)
मंदिर के ज्यादातर नीति नियम कुछ ऐसे ही है जो हर मंदिरों में होते हैं। जैसे की फोटोग्राफी ना करना, जूते चप्पल बाहर उतारना, मंदिर में योग्य कपड़े पहनना, उसके साथ कुछ अलग नियम यू है कि धातु वाले हथियार, शराब, तंबाकू, नशीले, पदार्थ जैसी सभी तरीके की चीजों पर प्रतिबंध है।
केवल कालीघाट सेनायत परिवार के अधिकृत पांडे ही गर्भगृह में पूजा कर सकते हैं। बाहरी पंडितों को गर्भगृह में सेवा करने की अनुमति नहीं, पंडित फीस नहीं मांग सकते पर दक्षिणा आपकी इच्छा पर निर्भर है और यदि कोई पंडा जबरदस्ती करें तो मंदिर प्रशासन को शिकायत कर सकते हैं।
कालीघाट काली शक्तिपीठ मंदिर के त्यौहार
त्योहार भारतीय संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। हम यह कह सकते हैं कि भारत की पहचान उसके त्योहार से है तो भारत के मंदिरों में त्योहारों को बहुत ही बेहतरीन तरीके से मनाया जाता है। यहां पर कालीघाट काली शक्तिपीठ मंदिर के त्यौहार के बारे में जानकारी दी गई है।
(1) काली पूजा:
काली पूजा जो दीपावली की रात होती है और यह कालीघाट काली शक्तिपीठ मंदिर की सबसे बड़ी पूजा और त्योहार है। यह सबसे महत्वपूर्ण और भीड़ भार वाला त्यौहार भी है। इस रात महानिशा पूजा होती है। पुजारी मां काली की विशेष तांत्रिक विधि से पूजा करते हैं, पूरा परिसर दीपों लाल फूलों और धूप से भर जाता है श्रद्धालु पूरी रात दर्शन के लिए कतार में खड़े रहते हैं।
(2) दुर्गा पूजा:
दुर्गा पूजा नवरात्रि के दौरान होती है और इसका रूप थोड़ा सा अलग होता है। यहां मां काली को दुर्गा के रूप में पूजा जाता है। सप्तमी अष्टमी और नवमी को विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। कुमारी पूजा भी कई बार आयोजित होती है और बंगाल की पारंपरिक ढाक और धुनुची नृत्य का अनूठा माहौल होता है।
(3) अमावस्या की रात्रि:
यह रात्रि को विशेष काली साधना की जाती है। हर अमावस्या कालीघाट में विशेष होती है। इनमें महालय अमावस्या, कार्तिक अमावस्या और वैशाख अमावस्या सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस समय पर तांत्रिक साधकों की भीड़ रहती है।
(4) दीपान्विता अमावस्या:
यह वह दिन है जब सभी देवियों का अर्धरात्रि में मिलन माना जाता है। यहां पर इस समय मां काली की गुप्त पूजा, दीपदान और रूद्राचार विधि जैसी चीजें की जाती है।
(5) रथ यात्रा:
यह परंपरागत रूप से भगवान जगन्नाथ का पर्व है लेकिन कालीघाट में इस दिन भगवती काली और शिव के लिए विशेष अभिषेक और मां के चरणों में रथ प्रसाद अर्पण किया जाता है।
(6) शिवरात्रि:
कालीघाट में मां काली के साथ साथ नाथ शिव की पूजा भी की जाती है। इस समय बेलपत्र अभिषेक, रूद्र जप और पूरी रात जागरण जैसी विशिष्ट चीज की जाती है जिससे वातावरण आध्यात्मिक हो जाता है।
(7) पौष परब; गंगा सागर मेला काल:
इस समय मंदिर में बड़ा भोग प्रसाद, विशेष आरती, साधु-संतों का आगमन होता है।
(8) दोल; होलिका उत्सव:
यहाँ रंग से ज्यादा नहीं खेला जाता, पर माँ पर गुलाल और अबीर चढ़ाया जाता है साथ ही कोलकाता की पारंपरिक ‘बसंती पूजा’ की जाती है। शाम की गीत भजन मंडली वातावरण को भक्ति में बनाते हैं इन सब का विशेष आकर्षण होता है।
(9) जन्माष्टमी (कृष्ण अष्टमी):
जन्माष्टमी जिसे कृष्ण अष्टमी भी कहा जाता है, बंगाल की शक्ति परंपरा में भी कृष्ण की पूजा होती है। उस समय मंदिर में संकीर्तन, तुलसी पूजा, अंकूट भोग, जैसी कई सारी चीज की जाती है।
(10) प्रतिदिन विशेष पूजा; शनिवार:
शनिवार काली माता को अत्यंत प्रिय माना जाता है। इस दिन हनुमान जी के भक्त भी बड़ी संख्या में आते हैं। विशेष रूप से नीलकंठ अभिषेक किया जाता है, साथ ही तांत्रिक पूजा और सारस भोग वितरण भी होता है।
कालीघाट काली शक्तिपीठ मंदिर में पूजा अर्चना:
मां का स्नान और श्रृंगार:
सुबह 4 से 6 के बीच में पुजारी माता का अभिषेक करते हैं। जिसमें दूध, दही, शहद, गंगाजल, चंदन जल जैसी चीजें शामिल होती हैं। उसके बाद मां पर लाल सिंदूर लगाया जाता है। लाल वस्त्र, पुष्प और चूड़ियां चढ़ाई जाती हैं और कुछ इस प्रकार माता को मां रूप से सजाया जाता है। [यह भक्तों को देखने नहीं दिया जाता यह मंदिर का आंतरिक अनुष्ठान है।]
- सुबह 4:00 से 5:00 के बीच मंगला आरती की जाती है।
- सुबह 5 से 6:30 के बीच सामान्य दर्शन का समय है।
- सुबह 6:30 से 7:00 के बीच विशेष पूजा जब मंदिर बंद रहता है।
- 7:00 से 10:30 तक मंदिर खुला रहता है जिस समय भक्त दर्शन कर सकते हैं।
- 10:30 से 12 के बीच मंदिर की आंतरिक क्रिया होती है। इस समय दर्शन धीरे हो सकते हैं या तो फिर प्रतिबंध भी हो सकता है।
- 12 से 13 के बीच में मध्याह्न भोग लगता है जिस समय मां को भोग लगाया जाता है ,आरती होती है और इस समय दर्शन धीमी गति से चलते हैं।
- 1:30 से शाम के 5:30 तक सामान्य दर्शन चलता रहता है।
- 5:30 से 6:30 के बीच आरती से पहले की तैयारी की जाती है जिसमें पुजारी विद्युत, दीप, धूप, श्रृंगार तैयार करते हैं और इस समय भीड़ थोड़ी बढ़ने लगती है।
- 6:30 से 7:30 के बीच संध्या आरती का समय है। यह दिन की सबसे भव्य और आकर्षक आरती है क्योंकि इस समय डाक, शंकर, दीप, घंटा जैसी चीजों के साथ आरती की जाती है।
- 7:30 से 9 के बीच रात के दर्शन का समय होता है और 9:00 के बाद नित्य पूजा समाप्त होते ही मंदिर बंद कर दिया जाता है।
कालीघाट काली शक्तिपीठ मंदिर के आसपास घूमने की जगह
(1) कालीघाट:
यह मंदिर से 300 मीटर की दूरी पर स्थित जगह है। कालीघाट पुराना पवित्र घाट है जहां मां “काली नदी स्नान” की परंपरा है। यहां पर स्थानीय साधु की उपस्थिति होती है, संगीत में पूजा का माहौल होता है।
(2) कालीघाट पेंटिंग गली:
यह मंदिर से तकरीबन 600 मीटर की दूरी पर स्थित एक प्रसिद्ध कालीघाट पटचित्र कला गली है जहां पर कलाकार लाईव पेंटिंग बनाते हैं। मां काली, कृष्णा, पौराणिक थीम जैसी कई सारी चीजों पर यहां पर कलाकार पेंटिंग बनाते हैं।
(3) अलीपुर जू:
यह मंदिर से तकरीबन एक पॉइंट पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित भारत का सबसे पुराना चिड़ियाघर है जहां पर वनस्पति गार्डन और बर्ड हाउस जैसी कई सारी चीजे हैं जो वन्य जीव प्रेमी को बेहद पसंद आ सकती है।
(4) नेशनल लाइब्रेरी कोलकाता:
यह मंदिर से तकरीबन 2.5 किलोमीटर की दूरी पर विशाल ग्रीन पार्क एरिया है जो ब्रिटिश कालीन आर्किटेक्चर और किताब प्रेमियों के लिए स्वर्ग माना जाता है।
(5) रविंद्र सरोवर झील:
यह मंदिर से तकरीबन दो किलोमीटर की दूरी पर सुंदर झील है। सुबह सुबह टहलने का यह बेहतरीन स्थान है और टूरिस्ट के लिए यह फोटोग्राफी स्पॉट भी है।
(6) सेंट पॉल कैथेड्रल:
यह मंदिर से तकरीबन 3.5 किलोमीटर की दूरी पर गोथिक आर्किटेक्चर जगह है, जो बेहद शांत विशाल प्रार्थना स्थल है और यहां पर सुंदर ग्लास कला भी है।
(7) बिरला मंदिर:
यह मंदिर से तकरीबन 3.5 किलोमीटर की दूरी पर सुंदर सफेद मंदिर है जो रात की रोशनी में बेहद आकर्षक लगता है।
(8) विक्टोरिया मेमोरियल:
यह मंदिर से तकरीबन 4.5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कोलकाता का सबसे प्रतीकात्मक स्थल है जो विशाल म्यूजियम के साथ बगीचे से घिरा है। फोटो के लिए यह टॉप स्पॉट माना जाता है।
(9) लोकल टी स्टॉल्स:
यह मंदिर से 200 या 500 मीटर की दूरी पर स्थित कालीघाट की कुल्लड़ चाय के लिए मशहूर जगह है। यहां पर स्ट्रीट स्नेक्स और मिठाई का आनंद आप ले सकते हैं।
(10) बांग्ला स्ट्रीट फूड जोन:
यह मंदिर से तकरीबन 500 मीटर की दूरी पर एक फूड जोन है जहां पर काठी रोल, मिष्टी दोई, भेल, पुचका, चाप जैसी कई सारी चीजे आप खा सकते हैं। यहां पर आने के बाद आपको बंगाली खाने का आनंद जरूर देना चाहिए।
(11) इंडियन म्यूजियम:
यह मंदिर से तकरीबन 6 किलोमीटर की दूरी पर भारत का सबसे बड़ा म्यूजियम है जहां पर प्राचीन कलाकृतियों से भरपूर भारतीय इतिहास आपको मिलेगा।
(12) नंदन आर्ट कंपलेक्स:
यह मंदिर से तकरीबन 5.5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक फिल्म, थियेटर, आर्ट्स प्रेमियों का केंद्र है। सत्यजीत रे आर्ट स्कूल के पास यह जगह है।
(13) पार्क स्ट्रीट नाइटलाइफ:
मंदिर से तकरीबन 6.5 किलोमीटर की दूरी पर केफे, रेस्टोरेंट, म्यूजिक क्लब, जैसी कई सारी चीजे हैं जो कोलकाता की सबसे जीवंत जगह में से एक है। यहां पर जाकर आप रात्रि जीवन देख सकते हैं।
(14) हावड़ा ब्रिज:
हावड़ा ब्रिज जिसे बाबू घाट भी कहते हैं यह मंदिर से तकरीबन आठ नौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक जगह है। नदी तट पर आप नाव राइड कर सकते हैं और सूर्यास्त का शानदार दृश्य देख सकते हैं।
(15) दक्षिणेश्वर कली मंदिर:
अगर आपके पास समय है तो मंदिर से तकरीबन 15 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिणेश्वर कली मंदिर जरूर जाएं क्योंकि यह मंदिर रसमणि रानी और रामकृष्ण परमहंस से जुड़ा है और गंगा के किनारे विशाल धार्मिक परिसर है।
कालीघाट काली शक्तिपीठ मंदिर जाने का बेहतरीन समय
मंदिर जाने के लिए सबसे बेहतरीन समय सर्दियों का माना जाता है उसे समय ठंड की वजह से आपको घूमने में आनंद आ सकता है।इसके अलावा आप त्योहारों के दौरान भी मंदिर में जा सकते हैं क्योंकि उसे समय मंदिर का वातावरण पूर्ण आध्यात्मिक होता है। ध्यान रखें कि किसी भी समय मंदिर जाने से पहले मंदिर के समय के बारे में जानकारी जरूर रखें।
कालीघाट काली शक्तिपीठ मंदिर जाने की सुविधा
मंदिर जाने के लिए आप किसी भी शहर से कोलकाता के लिए बस ट्रेन या फ्लाइट ले सकते हैं। मंदिर से 600 से 800 मीटर की दूरी पर मेट्रो लाइन है जहां पर आप मेट्रो से पहुंच सकते हैं। साथ ही आप सीधा मंदिर के गेट के लिए ऑटो रिक्शा या ओला जैसी सुविधा कर सकते हैं। मंदिर के लिए आपको कहीं से भी बस भी मिल जाएगी।
कालीघाट काली शक्तिपीठ मंदिर के आसपास रहने और खाने की सुविधा
मंदिर से 1 किलोमीटर की दूरी के अंदर अंदर आपको कई सारी लॉज और होटल मिल जाएगी। आपकी आर्थिक सुविधा के अनुसार आप वहां पर रह सकते हैं साथ ही आपको वहां का पारंपरिक भोजन भी प्राप्त हो जाएगा।
कालीघाट काली शक्तिपीठ मंदिर से जुड़े कुछ रोचक तथ्य
- ऐसा माना जाता है की काली मां की मूर्ति प्राकृतिक रूप से काली है, इस पर कोई रंग नहीं लगाया गया। ऐसा माना जाता है कि यह अद्भुत प्राकृतिक काला पिंड है।
- यहां की देवी की आंखें तीन टुकड़ों में बनी है जिससे हर दिशा में दिव्य दृष्टि बनी रहे। इसे बहुत ही दुर्लभ माना जाता है।
- ऐसा माना जाता है कि पुराना नाम कालीघाट नहीं था, बहुत बाद में पड़ा। “नखतला” और “नक्कोला” गाँव के नाम से धीरे-धीरे “कालीघाट” नाम पड़ा।
- ऐसा माना जाता है कि कालीघाट का शिवलिंग खुद ब खुद जमीन से प्रकट हुआ है।
- काली मां के पास का नट मंदिर सभी शास्त्रीय नृत्य का स्थल था। यहां पहले रजवाड़ी परिवारों के नृत्य प्रदर्शन हुआ करते थे।
- यहां पर चार शक्तियों का संयोग होता है जिसमें काली, सती, शिव और गंगा शामिल है और इसी संयोग को “चतुर्भुजा शक्ति क्षेत्र” भी कहा जाता है।
- काली मां का स्वरूप “दिगंबर” माना जाता है इसलिए यहां वस्त्र सिर्फ कमर के नीचे लगाए जाते हैं और यह मां काली का उग्र रूप दर्शाता है।
- यहां पर घंटी की आवाज बहुत दूर तक सुनाई देता है क्योंकि वह पंच धातु से बनी है।
- काली मां के चरण इस जगह पर अलग गर्भगृह में रखे गए हैं और भारत में बहुत कम शक्तिपीठ ऐसे हैं जहां पर मूर्ति और चरण अलग हो।
ध्यान दे : कालीघाट मंदिर के लिए कोई एक ऑफिशियल वेबसाइट नहीं है।